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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३९० क्षपकअनिवृत्तिकरण गुणस्थान के ३६ सत्त्वस्थान व उनके ३८ भंगों की सन्दृष्टि सत्व प्र. १३८ | १२२ | ११४ | ११३ | ११२ | नरक, तिर्यञ्च व देवायुरहित भन सत्व प्र. १३७ / १२१ ५ १०४ १०३ | १० आहारक | तीर्थङ्कर चतुष्करहित | रहित सत्व प्र. १३४ | ११८ भज सत्त्व प्र. तीर्थकर व आहारक चतुष्करहित भङ्ग जहाँ एक भंग है वहाँ भुज्यमानमनुष्यायुरूप भंग जानना। दो-दो भंगों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि जिसके तीर्थक्कर प्रकृति की सत्ता नहीं है ऐसे जीव के यदि क्षपक श्रेणी चढ़ते हुए अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में स्त्रीवेदका उदय हो तो वह पहले नपुंसकवेद का नाश करके पश्चात स्त्री वेदका नाश करेगा, किन्तु यदि श्रेणी चढ़ते हुए नपुंसकवेद का उदय है तो पहले स्त्रीवेदका नाश करेगा पश्चात् नपुंसकवेद का नाश होगा इसलिए दो-दो भंग होते हैं। अर्थात् नपुंसकवेद रहित स्त्रीवेद सहित १ भंग और दूसरा स्त्रीवेदरहित नपुंसकवेदसहित इस प्रकार दो भंग जानना अब क्षपकसूक्ष्मसाम्पराय और क्षीणकषायगुणस्थान में सत्त्वस्थान और भंग कहते हैं अणियहिचरिमठाणा, चत्तारिवि एक्कहीण सुहुमस्स । ते इगिदोण्णिविहीणं, खीणस्सवि होति ठाणाणि ।।३८९॥ अर्थ-क्षपकअनिवृत्तिकरण गुणस्थान में सज्वलनमान रहित १०३ प्रकृति रूप अन्तिम स्थान कहा था, उसकी चार पंक्तियों में क्रम से शून्य-एक-चार और पाँचप्रकृति घटाने से १०३-१०२-९९९८ प्रकृति रूप अन्तिम चार स्थान हुए | इन चारों में सवलनमाया घटाने से १०२-१०१-१८ और ९७ प्रकृतिरूप स्थान क्षपकसूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान के होते हैं तथा इन चारों ही स्थानों में सज्वलनलोभ
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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