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________________ ॐ .. B i ry? चोमसार कर्मकाण्ड-३८० असंयत ४ । १३४ | बद्धायुष्क | की अपेक्षा २०वाँ स्थान |१३४ (बद्धायुष्ककी अपेक्षा १९३ स्थानकी १३५ प्रकृतिमें से सम्यक्त्वप्रकृति कम की) ४ भंग, बदायुष्कके १०वें स्थानके समान ही जानना। असंयत ४ अन्नद्धायुष्क | की अपेक्षा २०वाँ स्थान । १३३ | १३३ (अबद्धायुष्कके १९वें स्थानकी १३४ प्रकृतिमें से १ सम्यक्त्वप्रकृति कम की) ४ भंग, अबद्धायुष्कके १०वें स्थान के समान हैं। आगे देशसंयत-प्रमत्त व अप्रमत्त इन तीन गुणस्थानों में स्थान और भङ्ग कहते हैं - देसतियेसुवि एवं, भंगा एक्जेक्क देसगस्स पुणो। पडिरासि बिदियतुरियस्सादीबिदियम्मि दो भंगा ॥३८२ ।। अर्थ- असंयतगुणस्थान के समान देशसंयतादि तीन गुणस्थानों में ४०-४० सत्त्वस्थान जानना और सर्वस्थानों में एक-एक भाग है, किन्तु देशसंयतगुणस्थान की द्वितीय और चतुर्थपंक्ति के (बद्धायुष्कअबद्धायुष्क) प्रथम व द्वितीय स्थान में दो-दो भङ्ग जानना। विशेषार्थ- देशसंयत-प्रमत्त व अप्रमत्त गुणस्थान में भी असंयतगुणस्थान के समान दो-छहसात-आठ और ९ प्रकृतिरहित पाँच स्थान बराबर लिखना तथा इसके नीचे-नीचे चार पंक्ति बद्धायुष्क की करना और उसके नीचे बध्यमान एक-एक आयु घटाकर अबद्धायुष्क की भी चार ही पंक्ति करनी। इन पंक्तियों में प्रथम पंक्ति तीर्थङ्कर और आहारकचतुष्क सहित है अत: यहाँ कोई प्रकृति कम नहीं की, द्वितीय पंक्ति में तीर्थङ्कर प्रकृति कम करना। तृतीय पंक्ति में तीर्थंकर प्रकृति मिलाना और आहारकचतुष्क कम करना, चतुर्थ पंक्ति में तीर्थङ्कर और आहारकचतुष्क ये पाँच प्रकृति कम करना, इस प्रकार बद्धायुष्क व अबद्धायुष्क की आठ पंक्ति के ४० स्थान हुए। यहाँ बद्धायुष्क के जो २० स्थान हैं वहाँ भुज्यमानमनुष्यायु और बध्यमानदेवायु ऐसा एक-एक ही भंग है, इसके बिना अन्य तीन आयु का बन्ध होने पर देशव्रत व महाव्रत नहीं होते (गाथा ३३४)। अबद्धायुष्क के जो २० स्थान हैं वहाँ मात्र भुज्यमानमनुष्यायुसम्बन्धी एक-एक ही भङ्ग है, किन्तु विशेषता इतनी है कि देशसंयतगुणस्थान में तीर्थकरप्रकृतिरहित द्वितीयपंक्ति और चतुर्थपंक्ति के दस स्थानों में से प्रथम व द्वितीय स्थान में दो-दो भंग हैं, तथा बद्धायुष्क की द्वितीय और चतुर्थ पंक्ति के प्रथम व द्वितीय स्थान में तो भुज्यमानमनुष्वायु और बध्यमानदेवायु तथा
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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