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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३५९
अर्थ - सासादनगुणस्थान में सर्वप्रकृतियों में से सात अथवा तीनप्रकृतिकमरूप दो सत्त्वस्थान हैं। मिश्रगुणस्थान में सर्वप्रकृतियों में से तीन, सात, सात और ११ प्रकृति कमरूप चारस्थान तो बद्घायुष्क की अपेक्षा और अबद्धायुष्क की अपेक्षा उनमें से भी एक-एक प्रकृति कमरूप चारस्थान बद्धायुष्क के समान ही जानना ! इसप्रकार सासादन-गुणस्थान में चार और मिश्रगुणस्थान में ८ स्थान जानने चाहिए। आगे सासादनगुणस्थान के सत्त्वस्थानों में जो प्रकृतियाँ कम हुई हैं उनके नाम कहते हैं
तित्थाहारचउक्वं, अण्णदराउगदुगं च सत्तेदे।
हारचउक वजिय तिणि य केई समुद्दिढें ॥३७३ ॥ अर्थ - सासादनगुणस्थान में तीर्थङ्करप्रकृति, आहारकचतुष्क और भुज्यमान-बध्यमानआयुबिना शेष दोआयु इन सातप्रकृतिबिना १४५ प्रकृतिरूप प्रथमस्थान तथा प्रथमस्थान में कम की गई सातप्रकृतियों में से आहारकचतुष्क (आहारकशरीर, आहारकअंगोपांग, आहारकशरीरबन्धन, आहारकशरीरसंघात) के बिना शेष तीनप्रकृति कम करने से १४५ रूप दूसरा स्थान जानना तथा १४५ प्रकृतिरूप इस सत्त्वस्थान में आहारकचतुष्क का सत्त्व कहा है, वह अन्य आचार्यों के मतानुसार है। मिश्रगुणस्थानसम्बन्धी सत्त्वस्थानों को कहते हैं -
तित्थण्णदराउदुगं, तिण्णिवि अणसहिय तह य सत्तं च।
हारचउक्के सहिया, ते चेव य होंति एयारा ॥३७४ ।। अर्थ - मिथ्रगुणस्थान में तीर्थकर, भुज्यमान-बध्यमानआयुबिना दोआयु इन तीन बिना १४५ प्रकृतिरूप प्रथमस्थान, तीर्थकर, भुज्यमान-बध्यमान आयुबिना दो आयु, अनन्तानुबन्धीकषायचतुष्क अथवा आहारकचतुष्क इन सातप्रकृतिबिना १४१ प्रकृतिरूप द्वितीयस्थान, तृतीयस्थान भी इसीप्रकार १४१ प्रकतिरूप ही है, तीर्थकर, भुज्यमान-बध्यमानआयुबिना दो आयु, अनन्तानुबन्धीकषायचतुष्क
और आहारकचतुष्क इन ११ प्रकृतिबिना १३७ प्रकृतिरूप चतुर्थस्थान इसप्रकार ये चारस्थान बदायुष्कापेक्षा तथा इनमें एक-एक प्रकृतिरूप चारस्थान अबद्धायुष्कापेक्षा जानना चाहिए। अथानन्तर उपर्युक्त गुणस्थानसम्बन्धी सत्त्वस्थानों में भङ्ग की संख्या कहते हैं -
साणे पण इगि भंगा, बद्धस्सियरस्स चारि दो चेव ।
मिस्से पणपण भंगा, बद्धस्सियरस्स चउ चऊणेया॥३७५ ।। अर्थ - सासादनगुणस्थानसम्बन्धी बद्धायुष्क की अपेक्षा दो सत्त्वस्थानों में पाँच और एक तथा