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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३५७
मिथ्यात्व
१
| अबद्धायुष्क |
की अपेक्षा सप्तम स्थान
। १३६ । उपर्युक्त भङ्ग में तिर्यञ्च मरणकर पनुष्य में
उत्पन्न हुआ। वहाँ बध्यमानआयु का बन्ध नहीं था, किन्तु सुरषट्कका बन्ध किया उस जीव के १३६ प्रकृति की सत्ता हो सकती है। यहाँ १३६ प्रकृति उपर्युक्त ही है, किन्तु
ज्यमानतिर्यञ्चाय के स्थान पर भुज्यमान मनुष्यायु होगी।
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मिथ्यात्व
बद्धायुष्क की
१
।
१३१
अपेक्षा
एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रियपर्यन्त जिस जीव के नारकषट्ककी उद्वेलना हुई तथा मनुष्यायु का बन्ध किया हो उसके १३१ प्रकृति की सत्ता पाई जाती है।
अष्टम स्थान
१३१ (१४८-१७, देव-नरकायु, तीर्थङ्कर, आहारकचतुष्क, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, देवद्विक, नरकद्विक, वैक्रि यिक द्रिक, त्रै क्रियिक शरीरबन्धन
और वैक्रियिकशरीरसंघात)
यहाँ भुज्यमान और बध्यमान तिर्थञ्चआयु और भुज्यमानतिर्यञ्चायु-वध्यमान-मनुष्यायुरूप | दो भंग हो सकते हैं, किन्तु पहला भंग पुनरुक्त होने से यहाँ एक ही भंग ग्रहण करना।
मिथ्यात्व
१
| १३०
अबद्धायष्क | की अपेक्षा अष्टम स्थान
बद्धायुष्क की अपेक्षा पूर्वकथित आठवें स्थान में जो १३१ प्रकृतियाँ कही हैं उनमें से यहाँ पर बध्यमान मनुष्य आयु कम करने पर १३० प्रकृतिरूप स्थान होता है।
एकेन्द्रिय या विकलत्रय जीव मरणकर मनुष्य में उत्पन्न हुआ उसके निवृत्त्यपर्याप्तावस्था में १३० प्रकृति की सत्ता हो सकती है, किन्तु अबद्धायुष्क की अपेक्षा कथित उपर्युक्त अष्टम स्थान में भुज्यमान तिर्यञ्चायु है और यहाँ | भुज्यमानमनुष्यायु है, इतना ही अन्तर है।