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मार्गदर्शक :--प्राचार्य की सदिसागर जी महाराज
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३५६
मिथ्यात्व
१
|बद्धायुष्क की|
अपेक्षा सप्तम स्थान
। १३७ |१४८-११, भुज्यमानतिर्यञ्चायु-बध्यमान
मनुष्यायु के बिना २ आयु,आहारकचतुष्क, तीर्थकर, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, देवगति और
देवगत्यानुपूर्वी। १३७ प्रकृति सहित यह सत्त्वस्थान एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रियपर्यन्त तिर्यञ्चोंके हो सकता है। जिसने देवद्विककी उद्वेलना की है ऐसा जीव तिर्थञ्चायु व मनुष्यायु बाँध सकता है अत: दो | भङ्ग होते हैं, किन्तु भुज्यमान-तिर्यञ्चायु व बध्यमानतिर्यञ्चायु को मानकर तो पुनरुक्त होने से उसे नहीं गिना। अत: तिर्यञ्चमनुष्यायु का एक भंग होता है।
मिथ्यात्व
१
अबद्धायुष्क | की अपेक्षा सप्तम स्थान
। १३६ | १३६ (बद्धायुष्कापेक्षा सप्तमस्थान में कथित
१३७ प्रकृति में से बध्यमानआयु कम करके १३६ प्रकृति रहती हैं।)
मिथ्यात्व
अबद्धायुष्क की अपेक्षा सप्तम स्थान
बद्धायुष्कापेक्षा सप्तमसत्त्वस्थान वाला एकेन्द्रिय से चतुरिन्द्रियपर्यन्त मिथ्यादृष्टिजीव मरणकर मनुष्य हुआ उसके अपर्याप्तावस्था में ५३६ प्रकृति की सत्ता होती है।
(१४८-१२, भुज्यमान मनुष्यायुबिना शेष तीन आयु, तीर्थङ्कर, आहारक चतुष्क, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और देवद्विक)
मिथ्यात्व
अबद्धायुष्क की अपेक्षा सप्तम स्थान
| वही एके न्द्रियसे चतुरिन्द्रियपर्यन्तका तिर्यञ्चजीव जिसके वैक्रियिक अष्टककी उद्वेलना हो गई है तथा मरकर पंचेन्द्रियतिर्यञ्च हुआ तथा पर्याप्तावस्था में सुर-षट्क (देवद्विक, बैंक्रियिकद्रिक, वैक्रियिकबन्धन, वैक्रियिकसंघात) का बन्ध किया ऐसे जीव की १३६ प्रकृति की सना हो सकती है।
१३६ (१४८-१२, भुज्यमानतिर्यञ्चआयु बिना तीन आयु, तीर्थक्कर, आहारक| चतुष्क, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, नरकद्विक)