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पृष्ठ सं.
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'७५७
८९८-९०८
७७१
गाथा सं.
____ विषय ७५५ लोकवाद ७५६
जितने वचनके भाजले नय हार्य श्री विद्याप II | परसमयका वचन 'सर्वथा' है
८. त्रिकरणचूलिकाधिकार के
मंगलाचरण |७५७ तीनकरणोंके नाम
७५८-७६७ | अधःकरण व अनुकृष्टिरचना .९०९-९१० ७६७ | अपूर्वकरण, स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक, गुणश्रेणी ९११-९१२ । ७७० अनिवृत्तिकरण
+९. कर्मस्थितिरचनाधिकार
मंगलाचरण ९१४-९१६ | ७७१-७७२ आवाधाकाल सातकर्मों का १५६-१५५ ९१७, १५८ ७७२, १२८ आयुकर्मकी आबाधा २१८,१५९ ७७३, १२९/ उदीरणाका आबाधाकाल ९१९-२४० | ७७४-७८८ निषेकरचना १६०-१६२ १३०-१३१ ९४१ ७८८ | आबाधाकाल समाप्त होने पर क्रमसे- निषेक निर्माण होते हैं
७८९ एकसमयप्रबद्धप्रमाज बंधता है और उत्तना मिर्जीर्ण होता है ९४३ ७८९ सत्तारूप द्रव्य कुछकम डेदगुणहानिस गुणित समयप्रबद्ध
त्रिकोणयन्त्र जोड़नेकी विधि ९४५-९४६ |७९०-७९१ स्थितिके भेदोंका कधन निरन्तर अन्धस्थान व करणपरिणामोंमें सान्तर बन्धस्धान ९४७-९६२ |७९१-८०२ स्थितिबन्धाध्यवसायस्थान ९६३-९६४ |८०३ स्थितिबन्धाध्यवसायस्धाना अनुभागाध्यवसायस्थान ९६५-९७२ |८०४-८०५ | प्रशस्ति
| ॥इति गोम्मटसारकर्मकाण्डः॥