________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३३४
में असत्त्व १ नरकायु का, सत्त्व १४७ प्रकृति का है। आगे प्रमत्तगुणस्थान से उपशान्तमोहगुणस्थानपर्यन्त असत्त्व नरकायु और तिर्यञ्चायु का, सत्त्व १४६ प्रकृति का । अन्य सर्वकथन गुणस्थानवत् जानना। उपशमसम्यक्त्व में असत्त्व-सत्त्व-सत्त्वव्युच्छित्तिसम्बन्धी सन्दृष्टि
सत्त्वयोग्यप्रकृति १४८, गुणस्थान ८
असत्त्व
गुणस्थान असयत
सत्त्व व्युच्छित्ति
विशेष १ (नरकायु) १५ (तिर्यञ्चायु)
१४८
देशसंयत प्रमत्त अप्रमत्त अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसाम्पराय । उपशान्तकषाय
१४६ १४६
.::
० यह कथन उस मत की अपेक्षा है जो
द्वितीयोपशमसम्यक्त्व में अनन्तानुबन्धी की ० । विसंयोजना का नियम स्वीकार नहीं करता है।
।
२ २
। १४६
वेदक (क्षायोपशमिक) सम्यक्त्व में सत्त्वयोग्यप्रकृति १४८, गुणस्थान असंयत से अप्रमत्तपर्यन्त चार हैं। गुणस्थानों में सत्त्वादि का सर्वकथन गाथा ३४२ की सन्दृष्टि के अनुसार जानना।
क्षायिकसम्यक्त्व में अनन्तानुबन्धी की चार कषाय और दर्शनमोहनीय की ३ इन सातप्रकृति बिना सत्त्वयोग्यप्रकृति ५४१ हैं। गुणस्थान असंयत से अयोगीपर्यन्त ११ हैं। यहाँ असंयतगुणस्थान में असत्त्व नहीं है अतः सत्त्वयोग्यप्रकृति १४५ हैं। नरकायुतिर्यञ्चायु की व्युच्छित्ति भी यहीं पर हो जाती है। क्षायिकसम्यक्त्वी तिर्यञ्च के देशसंयतगुणस्थान नहीं हो सकता, क्योंकि क्षायिकसम्यग्दृष्टि भोगभूमिजतिर्यञ्चों में ही उत्पन्न होता है और भोगभूमिजजीवों का नियत आहार होने से व्रत अर्थात् संयम नहीं हो सकता। अतः देशसंयतगुणस्थान में असत्त्व दो प्रकृति का, सत्त्व १३९ प्रकृति का । प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थान में भी १३९ प्रकृतियों का ही सत्त्व है। अपूर्वकरणगुणस्थान में दोनों (उपशमक्षपक) श्रेणी की अपेक्षा सत्त्व १३९ व १३८ प्रकृति का है। आगे अनिवृत्तिकरणादि गुणस्थानों में गुणस्थानवत् ही सर्वकथन है।