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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३२९
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१०४
प्रमत्तसंयत । २
। २ (नरक व तिर्थञ्चायु) अप्रमत्तसंयत
२ (नरक व तिर्यञ्चायु)
८ (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) अपूर्वकरण
१३८
• (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) अनिवृत्तिकरण
१० व १६ (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) भाग १ भाग २ ।
१२२ । ८ २६ व ८ (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) भाग३
१ (नपुंसकवेद) भाग ४
१ (स्त्रीवेद) भाग ५ ।
६ (हास्यादि नोकषाय) भाग ६
१ (पुरुषवेद) भाग ७
१ (सज्वलन क्रोध) भाग ८
१ (सञ्चलन मान) भाग ९
५ (सज्वलन माया) सूक्ष्मसाम्पराय
१०२
१ (सञ्चलन लोभ)
२ (नरक व तिर्यञ्चायु) उपशमसम्यक्त्वकषाय १
सहित उपशमश्रेणी की अपेक्षा उपशान्त
१० (८वें गुणस्थानवत) क्षायिक सम्यक्त्व सहित कषाय २
उपशम श्रेणी की अपेक्षा क्षीणकषाय
४७ व १६ (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) सयोगकेवली
६३ (गाथा ३४२ की सन्दृष्टि अनुसार) यह गुणस्थान सत्य व अनुभय मनोयोग व
वचनयोग में है ___ आहारक-आहारक मिश्रकाययोग में नरकायु व तिर्यवायुबिना शेष १४६ प्रकृति का सत्त्व है और गुणस्थान एक प्रमत्त ही है।
वैक्रियिककाययोग में सत्त्वप्रकृति १४८ हैं, गुणस्थान ४ हैं । यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में सत्त्वप्रकृति १४८, असत्त्व का अभाव है और सत्त्वव्युच्छित्ति नहीं है, क्योंकि तीर्थङ्काकी सत्तावाला तृतीयपृथ्वीपर्यन्त जाता है उसके अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त मिथ्यात्व रहता है इसीलिए यहाँ १४८ प्रकृति का सत्त्व कहा। सासादनमिश्न और असंयत गुणस्थान में गुणस्थानवत् सत्त्व-असत्त्वादि का कथन जानना।
उपशान्त
१३८