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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९६ उद्योत, नीचगोत्र, तिर्यञ्चगति इन आठ प्रकृत्तियों की व्युच्छित्ति यहाँ भी तिर्यञ्चायु आदि चार प्रकृति का उदय प्रथमोपशमसम्यक्त्व की अपेक्षा जानना, उदय ८६ प्रकृति का, अनुदयप्रकृति १४ हैं। प्रमत्तगुणस्थान में स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा की व्युच्छित्ति है, क्योंकि आहारकद्विक तो उपशमसम्यक्त्व में मूल में उदययोग्य नहीं है। प्रमत्तगुणस्थान में उदयप्रकृति ७८, अनुदयप्रकृति २२। अप्रमत्तगुणस्थान में अन्तिम तीनसंहनन की ही व्युच्छित्ति है, क्योंकि उपशमसम्यक्त्व में सम्यक्त्वप्रकृति का मूल में ही उदय नहीं है, उदययोग्य प्रकृति ७५, अनुदयप्रकृति २५। अपूर्वकरणगुणस्थान में हास्यादि ६ नोकषाय की व्युच्छित्ति, उदय ७२ प्रकृति का, अनुदय २८ प्रकृति का। अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में तीन वेद और सञ्चलनक्रोध-मान-माया हुन । प्रकृतियों की च्छितिक प्रकृति का उ4, ३४ प्रकृति का अनुदय है। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में सज्वलन लोभ की व्युच्छित्ति, उदय ६० प्रकृति का और अनुदय ४० प्रकृति का है। उपशान्तमोहगुणस्थान में वज्रनाराच और नाराच इन दो संहननों की व्युच्छित्ति, उदय ५९ प्रकृति का तथा अनुदय ४१ का है। उपशमसम्यक्त्व में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि उदययोग्यप्रकृति १००, गुणस्थान ८ उदय- । व्युच्छित्ति उदय गुणस्थान असंयत देशसंयत प्रमत्त अप्रमत्त अनुदय विशेष ० | १४(गुणस्थानोक्त १७-३ मनुष्य-तिर्यञ्च व नरकगत्यानुपूर्वी) ८ (प्रत्याख्यानावरणकषाय ४, तिर्यञ्चआयु, तिर्यञ्चमति, उद्योत और नीचगोत्र) ३ (स्त्यानगृद्धिआदि तीन निद्रा) ३ (अर्धनाराच-कीलक व असम्प्राप्तासृपाटिका संहनन) ६ (हास्य-रति-अरति-शोक-भय और जुगुप्सा) ६ (तीनवेद, सञ्चलनक्रोध-मान-माया) १ (सञ्ज्वलन (सूक्ष्म) लोभ) ४१ । २ (वज्रनाराच व नाराचसंहनन) अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसाम्पराय | उपशान्तमोह
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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