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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२७२ समाधान - सिद्धे सत्यारंभो नियमाय सिद्ध होते हुए भी पुनश्च आरम्भ नियम के लिए है अतः यहाँ पर ऐसा नियम है कि विग्रहगति में कार्मणयोग ही है अन्य योग नहीं है क्योंकि विग्रहमति में कार्मणवर्गणा के अतिरिक्त अन्य वर्गणा नहीं आती, अन्यत्र अन्य वर्गणाओं के कारण योग होता है इसलिए अन्यत्र कार्मणकाययोग नहीं होता है। शंका - विग्रहगति का अर्थ तो यह भी है कि विग्रह-नवीनशरीर को धारण करने के लिए जो गमन होता है वह विग्रहगति है। अतः यहाँ मिथ्यात्व, सासादन और असंयतगुणस्थान में तो विग्रहगति हो सकती है, किन्तु सयोगीगुणस्थान में तो विग्रहगति का अभाव है फिर वहाँ कार्मणकाययोग कैसे हो सकता है? समाधान - विग्रहगति में ही कार्मणकाययोग हो ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि प्रतर व लोकपूरणसमुद्धात में भी तीनसमयपर्यन्त कामकापयोग पायामाला है...... कार्मणकाययोग सम्बन्धी मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्व, सूक्ष्म और अपर्याप्त की व्युच्छित्ति, उदय ८७ प्रकृति का, अनुदय तीर्थंकर और सम्यक्त्व इन २ प्रकृति का है। सासादनगुणस्थान में अनन्तानुबन्धी की ४ कषाय, एकेन्द्रिय, स्थावर, विकलत्रय और स्त्रीवेद की व्युच्छित्ति, उदय ८१ प्रकृति का, अनुदय नरकद्विक और नरकायुसहित ८ प्रकृति का। असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति वैक्रियिकद्विकबिना १५ तथा देशसंयत की उद्योत बिना सात, प्रमत्त की आहारकद्विक और स्त्यानगृद्धिबिना शून्य । अप्रमत्तकी तीनसंहनन बिना एक सम्यक्त्व, अपूर्वकरणकी ६, अनिवृत्तिकरणसम्बन्धी स्त्रीवेद की व्युच्छित्ति सासादनगुणस्थान में ही हो जाने से ५, सूक्ष्मसाम्पराय की एक, उपशान्तमोह की शून्य, क्षीणमोह सम्बन्धी १६ इसप्रकार ये सर्व मिलकर ५१ प्रकृति की होती है, क्योंकि देशसंयत से क्षीणमोहगुणस्थानपर्यन्त कार्मणकाययोग नहीं होता है। यहाँ सम्यक्त्व, नरकद्विक, नरकायुसहित उदयप्रकृति ७५ एवं अनुदय १४ प्रकृति का है। सयोगकेवली में व्युच्छिन्न रूप ४२ प्रकृति में से वज्रर्षभनाराच, स्वरद्विक, प्रशस्त-अप्रशस्तविहायोगति, औदारिकद्विक, संस्थान ६, उपघात, परघात, उच्छ्वास और प्रत्येकशरीर के बिना शेष २५ प्रकृति की यहाँ सयोगकेवली में व्युच्छित्ति होती है। उदयरूप प्रकृति तीर्थकरसहित २५ और अनुदयप्रकृति ६४ हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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