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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२६२
प्रमत्त
८१
। ३६
।३६ (३०८-२ आहारकद्विक) |५ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार)
७२
४५
अप्रमत्त अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण| ६ सूक्ष्मसाम्पराय उपशान्तमोह क्षीणमोह सयोगकेवली | ३०
६ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) ६ (गाधा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) १ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) २ गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) १६(गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) ७५ (६०+१६७६-१ तीर्थकर) ३० (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) १२(गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार)
अयोगकेवली | १२
॥ इति कायमार्गणा ॥
अथ योगमार्गणा अब योगमार्गणा में सर्वप्रथम चारमनोयोग तथा सत्य, असत्य, उभय वचनयोगसम्बन्धी उदयादि का कथन करते हैं
मणवयणसत्तगे ण हि ताविगिविगलं च थावराणुचओ ।।३१०॥ अर्थ - सत्यआदि चारमनोयोग और सत्य, असत्य व उभय वचनयोग इस प्रकार इन ७ में सामान्य से उदययोग्य १२२ प्रकृति में से आतप, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, आनुपूर्वीचतुष्क और स्थावर चतुष्क इन १३ प्रकृति के बिना उदययोग्य प्रकृति १०९ तथा गुणस्थान १३ होते हैं।
विशेषार्थ - यहाँ गुणस्थान १३ कहे हैं, सो सत्य व अनुभयमनोयोग एवं सत्य वचनयोग की अपेक्षा कहे हैं, किन्तु असत्य व उभयभनोयोग में तथा असत्य व उभय वचन योग में १२ गुणस्थान ही होते हैं।
यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति मिथ्यात्व की, उदय १०४ प्रकृति का, अनुदय ५ प्रकृति का | सासादनगुणस्थान में न्युच्छित्ति अनन्तानुबन्धी चारकषाय की, उदय १०३ प्रकृति का, अनुदय ६