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अब कायमार्गणा में उदयादि का कथन करते हैं
एवं वा पणकाये, ण हि साहारणमिणं च आदावं । दुसु तद्दुगमुज्जोवं, कमेण चरिमम्हि आदावं ॥ ३०९ ॥
अर्थ- इन्द्रियमार्गणा में कथित एकेन्द्रियसम्बन्धी ८० प्रकृति में से साधारण प्रकृति कम करने से पृथ्वीकाय में उदययोग्य ७९, साधारण और आतपप्रकृति घटाने पर जलकाय में ७८, साधारण, आतप व उद्योत कम करने से ७७ प्रकृति तेजकाय वायुकाय में एवं आतपप्रकृति कम करने से वनस्पतिकाय में ७९ प्रकृतियाँ उदययोग्य जानना |
सासादन
विशेषार्थ- पृथ्वीका में उदययोग्य ७९ प्रकृति तथा गुणस्थान दो हैं । " णहि सासणो अपुणे साहारणसुहुमगेय तेउदुगे" गाथा ११५ के इस सूत्रवचन से पृथ्वी - जल और प्रत्येक वनस्पतिकाय में सासादनगुणस्थान वाला मरणकर उत्पन्न होता है। अत: इन तीनकायों में उत्पन्न हुए सासादनगुणस्थानवर्तीजीव के मिथ्यात्व, आतप, उद्योत, सूक्ष्म व अपर्याप्त ये पाँच प्रकृतियाँ उदययोग्य नहीं हैं और सासादनगुणस्थान तो इनके निर्वृत्त्यपर्याप्तावस्था में ही रहता है। स्त्यानगृद्धिआदि तीननिद्रा इन्द्रियपर्याप्त पूर्ण होने पर, उच्छ्वासप्रकृति उच्छ्वासपर्याप्त पूर्ण होने पर और परघातप्रकृति शरीर पर्याप्ति के पूर्ण होने पर उदययोग्य हैं अतः इन ५ प्रकृतियों का यहाँ उदय नहीं है । मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १०, उदयप्रकृति ७९ तथा अनुदयप्रकृति का अभाव है। सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्ति ६ प्रकृति की, उदय ६९ प्रकृति का अनुदय १० प्रकृति का है।
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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - २५९
अथ कायमार्गणा
उदय
गुणस्थान व्युच्छित्ति
मिथ्यात्व
१०
६
पृथ्वीकाय में उदयव्युच्छित्ति - उदय - अनुदय की सन्दृष्टिउदययोग्य प्रकृति ७९, गुणस्थान २
उदय
७९
६९
अनुदय
०
१०
विशेष
१० ( मिथ्यात्व, आतप, उद्योत, सूक्ष्म, अपर्याप्त, स्त्यानगृद्धि आदि तीननिद्रा, उच्छ्वास, परघात) ६ ( अनन्तानुबन्धीकी चारकषाय, एकेन्द्रिय और स्थावर)