________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२४१
में अनन्तानुबन्धी ४ कषाय की व्युच्छित्ति, मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) में सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति की व्युच्छित्ति
और असंयतगुणस्थान में अप्रत्याख्यान की चारकषाय, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति, नरकायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअङ्गोपाङ्ग इन १२ प्रकृतियों की उदयव्युच्छित्ति होती है।
विशेषार्थ - घनिरकसम्बन्धी मिथ्यात्वगुणस्थान में उदय ७४ प्रकृति का एवं मिश्रमोहनीय और सम्यक्त्वमोहनीय का अनुदय होता है। मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १ है अतः वह मिथ्यात्वगुणस्थान की अनुदयरूप दो तथा नरकगत्यानुपूर्वीसहित सासादन में अनुदयप्रकृति४,उदयप्रकृति ७२, मिश्रगुणस्थान में उदयप्रकृति ६९, मिश्रमोहनीयका उदय होने से अनुदयप्रकृति ७। असंयतगुणस्थान में उदयप्रकृति ७० तथा सम्यक्त्व और नरकगत्यानुपूर्वी का उदय होने से अनुदयप्रकृति ६। घर्मानरकसम्बन्धी उदयव्युच्छित्ति, उदय, अनुदयरूप प्रकृतियों की सन्दृष्टि
उदययोग्य प्रकृति ७६, गुणस्थान ४।
उदय
व्युच्छित्ति . मिथ्यात्व : ! ..
गुणस्थान
उदय ____ अनुदय .. ४.. !. ....
सासादन
विशेष | २ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व) १ (मिथ्यात्व) ४ (२+१+नरकगत्यानुपूर्वी) व्यु. ४ (अनन्तानुबन्धी) |७ (४+४-१ सम्यग्मिथ्यात्व) ६ (७+१-२ सम्यक्त्व, नरकगत्यानुपूर्वी) १२ (अप्रत्याख्यानकषाय ४, दुर्भग, अनादेय,
नरकायु, अयशस्कीर्ति, नरकद्विक, वैक्रियिकद्विक)
मिश्र
असंयत
अब द्वितीयादि छह पृथ्वियों में उदयादि का कथन करते हैं -
बिदियादिसु छसु पुढिविसु एवं णवरि य असंजदट्ठाणे।
णत्थि णिरयाणुपुवी तिस्से मिच्छेव वोच्छेदो॥२९३॥ अर्थ - वंशादि छह पृथ्वियों में घर्मावत् उदययोग्य प्रकृति ७६ हैं, किन्तु यहाँ विशेषता यह है कि असंयतगुणस्थान में नरकगत्यानुपूर्वी का उदय नहीं है, क्योंकि जिसके नरकायुका बन्ध हो गया