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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२४० तेउतिगूणतिरिक्खेसुज्जोवो बादरेसु पुण्णेसु। सेसाणं पयडीणं, ओघं वा होदि उदओ दु ।।२८९|| अर्थ - तेज-वायु और साधारणवनस्पतिकायिक के बिना अन्य बादरपर्याप्तक तिर्यञ्चों के उद्योतप्रकृति का उदय होता है और शेष प्रकृतियों का उदय गुणस्थान के क्रम से जानना । विशेष - आतपनामकर्म का उदय पृथ्वीकायिक में ही है। इस प्रकार पाँच गाथासूत्रों में उदय का विशेष नियम कहकर अब गतिमार्गणा सम्बन्धी कथन में सर्वप्रथम 'नरकगति' में उदयरूप प्रकृतियों को कहते हैं थीणतिथीपुरिसूणा, धादी णिरयाउणीचवेयणियं। णामे सगवचिठाणं, णिरयाणू णारयेसुदया ॥२९०॥ . अर्थ - स्त्यानगृद्धिआदि तीन, स्त्रीवेद और पुरुषवेद इन पाँच बिना घातिया कर्म की ४२ प्रकृति और नरकायु, नीचगोत्र, साता व असातावेदनीय एवं नामकर्म में से नारकियों के भाषापर्याप्तिके स्थान में होनेवाली २९ प्रकृतियाँ, नरकगत्यानुपूर्वी इस प्रकार ये ७६ प्रकृतियाँ नरकगति में उदययोग्य कही गई नामकर्मसम्बन्थी २९ प्रकृतियों के नाम कहते हैं वेगुव्वतेजथिरसुहदुग दुग्गदिहुंडणिमिणपंचिंदी। णिरयगदि दुब्भगागुरुतसवण्णचऊ य वचिठाणं ॥२९१॥ अर्थ - वैक्रियिकशरीर-वैक्रियिकअजोपाङ्ग, तैजस-कार्मण, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, अप्रशस्तविहायोगति, हुण्डकसंस्थान, निर्माण, पञ्चेन्द्रियजाति, नरकगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्ति, अगुरुलधु, उपधात, परधात, उच्छ्वास, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, वर्ण-रसगन्ध-स्पर्श ये २९ प्रकृतियाँ नारकीजीव के वचनपर्याप्ति के स्थान पर उदयरूप हैं। अब घर्मानामक प्रथम नरक में उदयव्युच्छित्ति, उदय-अनुदयरूप प्रकृतियों को कहते है। मिच्छमणंतं मिस्सं, मिच्छादितिए कमा छिदी अयदे। बिदियकसाया दुब्भगणादेज्जदुगाउणिरयचऊ ॥२९॥ अर्थ - यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में एक मिथ्यात्व की व्युच्छित्ति होती है। सासादनगुणस्थान
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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