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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२३४
अयोगीगुणस्थान में एक जीवापेक्षा ३० व १२ प्रकृति की क्रम से व्युच्छित्ति कही है एवं नानाजीवों की अपेक्षा २९ व १३ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति कही गई है।
जिस प्रकार अन्य गुणस्थानों में साता-असातावेदनीयजन्य सुख-दुःख होता है उसी प्रकार केवलीभगवान् के भी होना चाहिए। ऐसी शंका होने पर आचार्य समाधान करते हुए अगली गाथा कहते हैं
णवा य रायदोसा, इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो।
तेण दु सादासादजसुहदुक्खं णत्थि इंदियजं ॥२७३॥ अर्थ - लेवलीभगनान के प्रालिकों का नाश हो जाने से राग के कारणभूत चार प्रकार की माया, चारप्रकार का लोभ, तीनवेद, हास्य-रति तथा द्वेष के कारणभूत चारप्रकार का क्रोध, चार प्रकार का मान, अरति, शोक, भय और जुगुप्साका निर्मूल नाश हो गया है अत: इनका राग-द्वेष नष्ट हो चुका है तथा युगपत् सकलतत्त्वप्रकाशी ज्ञान में क्षयोपशमरूप परोक्ष मतिज्ञान और श्रुतज्ञान नहीं हो सकते इसलिए इन्द्रियजनित ज्ञान नष्ट हो गया, इसी कारण केवली के साता और असातावेदनीय के उदयसे सुख-दुःख नहीं है, क्योंकि सुख-दुःख इन्द्रियजनित हैं तथा वेदनीय के सहकारी कारण मोहनीय का अभाव हो गया है अत: वेदनीय के उदय होने पर भी वह सुख-दुःख देने रूप कार्य करने में असमर्थ
है।
वेदनीय कर्म केवली के इन्द्रियजन्य सुख-दुःख का कारण क्यों नहीं है? इसके उत्तरस्वरूप दो गाथाएँ कहते हैं
समयट्ठिदिगो बंधो, सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स। तेण असादस्सुदओ, सादसरूवेण परिणदि ॥२७४॥ एदेण कारणेण दु, सादस्सेव दु णिरंतरो उदओ।
तेणासादणिमित्ता, परीसहा जिणवरे णत्थि ॥२७५।। अर्थ - केवली भगवान के सातावेदनीय का बन्ध एकसमय की स्थितिवाला है अत: उदयरूप ही है तथा केवली के असाता वेदनीय का उदय सातारूप से परिणत होता है॥२७४।।
केवली के निरन्तर साता का ही उदय है, अतः असाता के उदय से होने वाले (क्षुधा,पिपासा,शीत,उष्ण,दंशमशक,चर्या, शय्या, निषद्या,रोग,तृणस्पर्श और मल) परीषह नहीं होते हैं॥२७५||