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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२११
पंचेन्द्रिय तिर्यंच और मनुष्य जब नरक को जाते हैं तब नरकानुपूर्वी का उदय होता है। उससे पहले तिर्यंच या मनुष्य पर्याय में जो आकार होता है उसका नाश नहीं होता। इससे वहाँ पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच या मनुष्य की जघन्य अवगाहना तो घनांगुल के संख्यातवें भाग है। उससे पूर्वोक्त क्षेत्र को गुणा करने पर जो क्षेत्र का प्रमाण हो सो नरकानुपूर्वी का पहला भेद है। उन्हीं की उत्कृष्ट अवगाहना संख्यात घनांगुल प्रमाण है। उसको पूर्वोक्त क्षेत्र से गुणा करने पर जो प्रमाण हो सो नरकानुपूर्वी का अन्तिम भेद है। "आदि अंते सुद्धे वहिहिदे रूवसंजुदे ठाणा" इस सूत्र के अनुसार अन्तिम भेद में जितना क्षेत्र के प्रदेशों का प्रमाण हो उसमें से पहले भेद के क्षेत्र के प्रदेशों के प्रमाण को घटाने पर जो शेष रहे उसमें एक से भाग देकर एक जोड़ने पर जो प्रमाण हो. उतने नरकानुपर्वी के उत्तरोता भेद होते हैं।
उत्सेध घनामुलके संख्यातवेंभाग मात्र सबसे जघन्यअवगाहना के साथ नरकगति को जानेवाले और विशिष्ट मुखाकार रूप से स्थित सिक्थमत्स्य के नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी का एक विकल्प पाया जाता है। पुन: उसी जघन्यअवगाहना के साथ नरकगति को जाने वाले दूसरे सिक्थमत्स्यके नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी का दूसरा विकल्प पाया जाता है, क्योंकि पहले के जीवप्रदेशों का अनुपरिपाटी से जो अवस्थान पाया जाता उससे यहाँ पर पहले के आकाशप्रदेशों से पृथाभूत आकाशप्रदेशों के सम्बन्ध से भिन्न अनुपरिपाटी का अबस्थान देखा जाता है। अब उसी सबसे जघन्यअवगाहना के साथ नरकगति को जानेवाले अन्य सिक्थमत्स्य के नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्मका तृतीयविकल्प प्राप्त होता है, क्योंकि पहले की अनुपरिपाटी रूप से जो अवस्थान है इससे यहाँ पर भी पहले के आकाशप्रदेशों से पृथग्भूत आकाशप्रदेशों के सम्बन्ध से अन्यअनुपरिपाटी का अवस्थान उपलब्ध होता है, यह कारण सर्वत्र कहना चाहिए। पुनः सबसे जघन्यअवगाहना के साथ अलब्धपूर्व मुखाकार रूप से नरकगति को जानेवाले अन्य सिक्थमत्स्य के नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी का चतुर्थविकल्प होता है,क्योंकि पहले नहीं उपलब्ध हुए ऐसे मुखाकार रूप से वह परिणत हुआ है। पुन: उसी सर्वजघन्यअवगाहना के साथ नरकगति को जानेवाले अन्य सिक्थमत्स्य के नरकगति प्रायोग्यानुपूर्वी का पाँचवाँ विकल्प उपलब्ध होता है, क्योंकि यह अलब्धपूर्व मुखाकार रूप से परिणमित हुए द्रव्य का कारण है। इस प्रकार छह, सात, आठ, नौ, दस, आवलि, उच्छ्वास, स्तोक, लव, घटिका, मुहूर्त, दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, पूर्व, पल्य, सागर और राजूरूप तिर्यक्प्रतर तक नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी के विकल्प कहने चाहिए। पुन: इसी क्रम से दो-तीन आदि तिर्यप्रतर विकल्पों को सूच्यङ्गुल के असंख्यातवेंभाग मात्र तिर्यप्रतरों के जितने आकाशप्रदेश होते हैं उतने मात्र नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी के विकल्प प्राप्त होने तक बढ़ाते जाना चाहिए। इतनी विशेषता है कि नूतन-नूतन मुखविकल्पों के साथ नरकों में उत्पन्न होनेवाले सिक्थमत्स्यों की वह सबसे जघन्य अवगाहना ध्रुव करनी चाहिए। राजुप्रतर,राजुवर्ग और तिर्यक्प्रतर ये एकार्थवाची शब्द हैं। सूच्यगुल
१. धवल पु. १३ पृ. ३७२ से ३७५ तक।