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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२०७
विशेषार्थ : जघन्ययोगस्थान में श्रेणी के असंख्यातवेंभाग प्रमाण जघन्यस्पर्धक प्रमाणराशि हैं, जघन्ययोगस्थान से जधन्यसमयप्रबद्धप्रमाण प्रदेशों का बन्ध होता है यह फलराशि है, एक-एक योगस्थान में सूच्यङ्गुलके असंख्यातवेंभागप्रमाण जघन्यस्पर्धक बढ़ते हैं सो यह इच्छाराशि है। फलराशि से इच्छाराशि को गुणाकर प्रमाणराशिका भाग देने पर जो लब्ध आया उतने-उतने प्रदेशों की अधिकता लिये एक-एक उपरितन योगस्थानों में समयप्रबद्ध बढ़ता है अर्थात् जघन्ययोगस्थान से जघन्यसमयप्रबद्ध बंधता है तथा इसके अनन्तरवर्तीयोगस्थान से इतने प्रमाण वृद्धिगत होता हुआ समयप्रबद्ध बँधता है। इस प्रकार निरन्तर बढ़ता हुआ जघन्ययोगस्थान जहाँ दुगुना होता है वहाँ जघन्यसमयप्रबद्ध भी दूना है
और जहाँ जघन्ययोगस्थान चारगुणा है वहाँ जघन्यसमयप्रबद्ध भी चारगुणा बंधता है। इस प्रकार सञीपर्याप्तके उत्कृष्टयोगस्थानमें जघन्ययोगस्थान पल्यके अर्धच्छेदों के असंख्यातवेंभागगुणे होते हैं। यहाँ जघन्यसमयप्रबद्धको पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग से गुणाकरे ऐसा समयप्रबद्ध बंधता
है।
अथानन्तर इसी बात को पाँच गाथाओं द्वारा कहते हैं -
बीइन्दियपज्जतजहण्णट्ठाणा सण्गिपुण्णस्स। ...
उक्कस्सट्ठाणोत्ति य, जोगट्ठाणा कमे उढ्ढा ।।२५१॥ अर्थ : द्वीन्द्रियपर्याप्त जीव के जघन्यपरिणामयोगस्थान से सङ्घीपर्याप्तजीव के उत्कृष्टपरिणामयोगस्थानपर्यन्त परिणामयोगस्थान क्रम से एक-एक स्थान में समानवृद्धि'- रूप प्रमाण से बढ़ते हुए जानने।
सेढियसंखेजदिमा, तस्स जहण्णस्स फड्ढया होति।
अंगुलअसंखभागा,ठाणं पडि फड्ढया उड्ढा ॥२५२॥ अर्थ : द्वीन्द्रियपर्याप्तकका जघन्यपरिणामयोगस्थान जगत्श्रेणी के असंख्यातवेंभाग मात्र स्पर्धकोंके समूहरूप है और इसके बाद प्रत्येक स्थान के प्रति सूच्यङ्गुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण जघन्यस्पर्धक बढ़ते हुए जानने तथा जघन्ययोगस्थान के जितने अविभागप्रतिच्छेद हैं उनको जगतश्रेणी के असंख्यातवें भाग से भाग देने पर सूच्यङ्गुलके असंख्यातवेंभाग मात्र जघन्यस्पर्धकप्रमाण एकयोग प्रक्षेप प्राप्त होता है। अत: एक योग प्रक्षेपप्रमाण अविभागप्रतिच्छेद एक-एक योगस्थान में बढ़ते हैं।
१. “जोगपक्लेवो अंगुलस्म असंखेजदिभागमेत्तजहण्णफद्दयपमाणो वञ्चिहाणिमभावेण अवद्विदो आगच्छदि।" (धवल
पु. १०, पृ. ४८४) २. देखो धवल पु. १० पृ. ४८४ सूत्र १८९ की टीका।