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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१८५ सव्वे जीवपदेसे, दिवड्वगुणहाणिभाजिदे पढमा।
उवरिं उत्तरहीणं, गुणहाणिं पडि तदद्धकमं ॥२२८ ॥ अर्थ - जीवके सर्वप्रदेश लोकप्रमाण है उनमें डेढगुणहानिआयामका भाग देने पर जो संख्या आवे वह प्रथमगुणहानिके प्रथमस्पर्धककी प्रथमवर्गणा होती है। आगे-आगे एक-एक विशेष (चय) घटाने से एक-एक वर्गणा होती है तथा प्रत्येकगुणहानि में प्रथमनिषेकका प्रमाण क्रम से आधा-आधा जानना एवं प्रथमवर्गणाको दो गुणहानिका भाग देने पर जो प्रमाण होता है उतना विशेष (चय) का प्रमाण समझना। विशेषार्थ - निषेकसम्बन्धी सन्दृष्टि इस प्रकार है - (धवल पु. १० पृ. ७६)
५६ । ११२
८० | ४० ८८ +१७६ +३५२ +४१६ +२०८ +१०४ +५२ +२६ - १४२२
सन्दृष्टि में गुणहानि का अध्वान ४, योगस्थान का अध्वान ३२, नानागुणहानिशलाकायें ८ (यवमध्य से नीचे की ३ और ऊपर की ५) नीचे व ऊपर की अन्योन्याभ्यस्त राशि का प्रमाण ८, ३२ (ध. पु. १० पृ.७६) गाथार्थ का स्पष्टीकरण गाथा २२९ के विशेषार्थ में सर्वजीवप्रदेश ३१०० के दृष्टान्त से बताया है।
फड्ढयसंखाहि गुणं, जहण्णवग्गं तु तत्थ तत्थादी।
बिदियादिवग्गणाणं, वग्गा अविभाग अहियकमा ॥२२९ ।। अर्थ- जघन्यवर्ग को स्पर्धककी संख्यासे गुणा करने पर उस स्पर्धककी प्रथम वर्गणाके एक वर्ग का प्रमाण प्राप्त होता है। द्वितीयादिवर्गणा के वर्ग में क्रमश: एक-एक-अविभागप्रतिच्छेद बढ़ता जाता है। १. "पढमाए वग्गणाए जीवपदेसपमाणेण सवजीवपदेसा केवचिरेण कालेण अवहिरिजंति? दिवङ्च गुणहाणिहाणंतरेण
कालेण अवहिरिजंति ।" धवल पु. १० पृ. ४४५-४४६ । २. "को विसेसो? दोगुणहाणीहि सेडीहि असंखेजदिभागमेत्ताहि पढमवग्गणाजीवपदेसेसु खंडिदेसु तत्थ एगखंडपत्तो।"
धवल पु. १० पृ. ४४४।