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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१६४
अन्तरायकर्म की ५ प्रकृति देशघाति हैं। इनमें अधिकक्रम से कर्मपरमाणुका विभाजन होगा। अधिकपरमाणु अन्तिम वीर्यान्तरायप्रकृतिको, उससे कम उपभोगान्तराय को, उससे कम भोगान्तरायको, इससे कम लाभान्तराय को एवं सबसे कमद्रव्य दानान्तरायप्रकृतिको मिलेगा। अथानन्तर मोहनीयकर्म में विशेषता दिखाते हैं -
मोहे मिच्छत्तादीसत्तरसण्हं तु दिज्जदे हीणं।
संजलणाणं भागेव होदि पणणोकसायाणं ॥२०२।। अर्थ - मोहनीयकर्म के मिथ्यात्वादि १७ प्रकृतियों में हीनक्रम से द्रव्य दिया जाता है। सज्वलनकषाय के समान ५ नोकषाय का बँटवारा जानना ।
विशेषार्थ - मोहनीयकर्म में मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीलोभ-माया-क्रोध और मान तथा सञ्चलनलोभ-माया-क्रोध व मान, प्रत्याख्यानलोभ-माया-क्रोध व मान, अप्रत्याख्यानावरणलोभ माया-क्रोध व मान इन १७ प्रकृतियों में होन क्रमसे द्रव्य देना एवं पाँच नोकषाय का द्रव्य सज्वलन के समान है। ९ नोकषाय में से एक समय में युगपत् पाँचप्रकृतिबन्ध होता है, अत: यहाँ पाँच ही नोकषाय कही। तीनवेदों में से एकही वेदका, रति-अरति में से एकका, हास्य-शोक में से एकका तथा भय-जुगुप्सा का इस प्रकार युगपत् पाँच नोकषाय बँधती हैं। अथान्तर इनके विभाग का क्रम दिखाते हैं -
संजलणभागबहुभागद्धं अकसायसंगयं दव्वं ।
इगि भागसहियबहुभागद्धं संजलणपडिबद्धं ।।२०३॥ अर्थ - नोकषाय और सञ्चलन को बहुभाग द्रव्य मिला था इस द्रव्य में से आधा नोकषाय का और उसमें एकभाग सहित बहुभाग का आधा सज्वलन का द्रव्य है।
विशेषार्थ - मोहनीयकर्म के सम्पूर्णद्रव्य का प्रमाण पहले बताया जा चुका है, उसमें अनन्तका भाग देने पर एक भाग तो सर्वघाति है और बहुभागदेशधाति है। देशघातिद्रव्य में आवली के असंख्यातवेंभाग का भाग देना तथा जो लब्ध आया उसमें से एक भाग पृथक् रखकर बहुभाग का आधाभाग नोकषायका है और शेष एक भाग सहित बहुभाग का आधा सञ्वलनकषायका देशघातिद्रव्य होता है। इस प्रकार यह तीन प्रकार का द्रव्य हुआ, इनमें सर्वचातिद्रव्य का विभाग करते हैं -
सर्वघातिद्रव्य में आवली के असंख्यातभाग का भाग देना उसमें से एकभागको पृथक् रखकर शेष बहुभाग के १७ भाग करके एक-एक भाग एक-एक प्रकृति को देना तथा जो एकभाग रहा उसमें