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गोम्मटसारकर्मकाण्ड-१५३ __ अर्थ - ज्ञानावरण, दर्शनावरण और मोहनीय, इन तीन मूलप्रकृतियों का जो अपना द्रव्य है उसमें अनन्त का भाग देने से एकभाग तो सर्वघाति का द्रव्य होता है तथा शेषअनन्त बहुभागप्रमाणद्रव्य देशधाति का है।
विशेषार्थ - सर्वधातियाद्रव्य का सर्वघाति और देशघातिरूप बँटवारा आगे कहेंगे। देशघातिरूप मतिज्ञानावरणादिके द्रव्य का जो प्रमाण है उसमें सर्वघातिसम्बन्धी परमाणुओं के प्रमाण के लिए प्रतिभागहार का प्रमाण कहते हैं।
शंका - देशघातिप्रकृतियों में सर्वघातिस्पर्धक कैसे हो सकते हैं?
समाधान - पहले अनुभागबन्ध में मतिज्ञानावरणादिका भाग अनुभाग शैल, अस्थि, दारु और लतारूप से चार प्रकार का कहा था। इनमें दारुभाग का तो अनन्तवाँभाग और सम्पूर्ण लताभाग तो देशघाति है। इस प्रकार देशघातिरूप अनुभाग को धारण करने वाले परमाणु देशघातिद्रव्य हैं। शैलभाग, अस्थिभाग तथा दारु का बहुभाग सर्वचातिरूप है इस अनुभाग को धारण करने वाले परमाणु सर्वघातिद्रव्य हैं ऐसा जानना। अब सर्वधाति द्रव्य का प्रमाण निकालने के लिए प्रतिभागहार का प्रमाण कहते हैं -
देसावरणण्णोण्णब्भत्थं तु अणंतसंखमेत्तं खु।
सव्वावरणधणटुं पडिभागो होदि घादीणं ॥१९८॥ अर्थ - देशघातिरूप ज्ञानावरणादि प्रकृतियों की अन्योन्याभ्यस्तराशि अनन्त संख्याप्रमाण है। यही राशि सर्वघातिप्रकृतियों का द्रव्यप्रमाण निकालने के लिए घातिया कर्मों की प्रतिभागरूप जानना।
विशेषार्थ - चारज्ञानावरण, तीनदर्शनावरण, पाँचअन्तराय, चारसज्वलनकषाय और नोकषाय के परमाणुओं की नानगुणहानिशलाका अनन्त है तथा जितनी नानागुणहानि है उतने प्रमाण २ के अङ्क लिखकर परस्पर में गुणा करने से अन्योन्याभयस्तराशिका प्रमाण होता है यह भी अनन्तसंख्यामात्र है। अक्क सन्दृष्टि -
द्रव्य की संख्या ३१००, स्थितिस्थान ४०, एक-एक गुणहानि का प्रमाण ८, इससे दूना (१६) दो गुणहानिका प्रमाण, नानागुणहानि ५ है। अत: नानागुणहानिप्रमाण २ के अङ्क लिखकर २४२४२४२४२ परस्पर गुणा करने पर लब्ध ३२ आया सो यह अन्योन्याभ्यस्तराशि का प्रमाण जानना। इसकी रचना जैसे ६३०० द्रव्य और स्थान ४८ का दृष्टान्त पूर्व गाथा १६२ में कहा था और आगे भी गाथा ९२३ में कहेंगे वैसे ही जानना। अर्थसन्दृष्टि में अनुभाग की अपेक्षा द्रव्यप्रमाण का कथन है।