SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 190
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Be - ANN गोम्मटसारकर्मकाण्ड - १५२ विशेष - ज्ञानावरणीय के योग्य जो द्रव्य है, वही ५ ज्ञानावरणीयरूप से परिणमन करता है, क्योंकि वह अन्यके अयोग्य है। इसी प्रकार सर्वकर्मों के विषय में जानना चाहिए, अन्यथा ज्ञानावरणीयका जो द्रव्य है उसे ग्रहणकर मिथ्यात्वादि कारणसे ज्ञानावरणीयरूप से परिणमाकर जीव परिणमन करते हैं यह सूत्र नहीं बन सकता । " आठों प्रकार की कार्मणवर्गणाओं में अन्तरका अभाव है अतः यह नहीं कहा गया कि कार्मणवर्गणाएँ आठ हैं। ये आठों ही वर्गणाएँ पृथक् पृथक नहीं रहतीं, अपितु मिश्रित होकर रहती हैं, अन्यथा "आयुकर्म का भाग स्तोक है, नामकर्म और गोत्रकर्मका भाग उससे अधिक है" इत्यादि प्रकार से उपदेश सम्भव नहीं हो सकता था । अब उत्तरप्रकृतियों में बँटवारे का क्रम कहते हैं उत्तरपयडी पुणो मोहावरणा हवंति हीणकमा । अहियकमा पुण णामाविग्धा व ण भंजणं सेसे ॥ १९६ ॥ अर्थ - उत्तरप्रकृतियों में मोहनीय, ज्ञानावरण और दर्शनावरण के भेदों में क्रम सें हीन-हीनद्रव्य है तथा नाम व अन्तरायकर्म के भेदों में क्रम से अधिक अधिक द्रव्य है। वेदनीय, गोत्र और आयुकर्म के भेदों में बँटवारा नहीं होता, क्योंकि इनकी एककाल में एकही प्रकृति बँधती है, अतः इनको मूलप्रकृति के समान ही द्रव्य मिलता है। विशेषार्थ - ज्ञानावरण में मतिज्ञानावरण के द्रव्य से श्रुतज्ञानावरण का द्रव्य स्तोक है, इससे अवधिज्ञानावरण का द्रव्यहीन है यही क्रम शेष कर्मों के भेदों में भी जानना, किन्तु नाम और अन्तराय कर्म के भेदों में क्रम से अधिक अधिक द्रव्य है, जैसे अन्तरायकर्म में दानान्तराय के द्रव्य से लाभान्तरायका द्रव्य अधिक है, इससे भोगान्तरायका द्रव्य अधिक है। इस प्रकार अधिकक्रम जानना | वेदनीय, गोत्र और आयुकर्म में बँटवारा नहीं है। जैसे वेदनीयकर्म में साताका बन्ध होगा या असाताका, दोनों का एकसमय में युगपत् बन्ध नहीं होगा। इसी प्रकार गोत्र व आयुकर्म में भी जानना । इन तीनों कर्मों की जिस उत्तरप्रकृतिका जिस समय बन्ध होगा उस समय जो मूलप्रकृतिका द्रव्य प्रमाण है, वही उत्तरप्रकृतिका भी जानना । - अथानन्तर घातिया कर्मों में सर्वघाति तथा देशघाति का बँटवारा कहते हैं सव्वावरणं दव्वं अणंत भागो दु मूलपयडीणं । सेसा अनंतभागा देसावरणं हवे दव्वं ॥ १९७ ॥ २. ध. पु. १४ पृ. ५५३-५४ १. वर्गणाखण्ड, बन्धानुयोगद्वार चूलिका, सूत्र ७५८
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy