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अर्थात् जिलप्रकार चक्रवर्ती ने भरतक्षेत्र के छहखंड अपने चक्ररत्नरी निर्विघ्नपूर्वक साधं है, उसीप्रकार मैंने भी बुद्धिरूपी चक्रसे जीवस्थान', क्षुद्रबन्ध, बन्धस्वामि, वेदनाखंड, वर्गणाखंड और महाबन्ध के भेदरूप सिद्धान्तग्रन्थके इन छहखण्डोंको भलीभाँति साधा है। नेमिचन्द्राचार्य द्वारा गुरु स्मरण
णमिऊण अभयणंदि सुयसायरपारगिंदणंदिगुरूं।
वर वीरणंदिणाहं पयडीणं पच्चयं वोच्छं ॥७८५11 गो. क. ।। अर्थात् मैं नेमिचन्द्राचार्य अभयनन्दि नामक मुनीश्वरको, शास्त्रसमुद्रके पारगामी इन्द्रनन्दि नामक गुरुको तथा उत्कृष्ट वीरनन्दि नामक गुरुको नमस्कार करके कर्मप्रकृतियोंके प्रत्यय कहूंगा 1 उक्त गाधामें आचार्यने अपने तीन गुरूओंका नामस्मरण किया है। गोम्मटसार का रचना-स्थान
चन्द्रगिरिपर गोम्मटराय (चामुण्डराय) द्वारा निर्मापित जिनालयमें स्थापित एक हस्तप्रमाण इन्द्रनीलमणिकी श्री नेमिनाथ भगवान्की प्रतिमाके सम्मुख उसी जिनालयमें गोम्मटसार ग्रन्थकी रचना हुई थी इसीलिये गोम्मटसारके आयमंगलमें नेमिनाथ भगवानका स्मरण निम्न गाथामें किया गया है
सिद्धं सुद्धं पणमिय जिणिंदवरणेमिचंदमकलंकं ।
गुणरयणभूषणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥१॥ गो.जी. रचनाकाल
श्री चामुण्डरायने स्वयं अपना चामुण्डपुराण लिखा है जिसमें अपने कार्योंका वितरण दिया है, किन्तु मूर्तिनिर्माण तथा मोम्मटसारके विषयमें कुछ उल्लेख नहीं किया। वह पुराण शकसम्बत् १.०० तदनुमा वि. सं. १०३५ में लिखा गया है। चामुण्डरायपुराणमें मूर्तिनिर्माण व गोम्मटसारके उल्लेख न होनेसे यह प्रतीत होता है कि ये कार्य वि. सं. १०३१ के पश्चात् हुए हैं। बाहुबलीरितम गोम्मटेशकी प्रतिष्ठाका समय वि. सं. १०३७-३८ बतलाया गया है। उस समय गंगदेशमें राचमल्लका राज्यकाल धा। त्रिलोकसार की टीका लिखते हुए श्री माधवचन्द्राचार्य त्रैविद्यदेवने जो नेमिचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्तीके समकालीन थे, त्रिलोकसारके मंगलाचरणमें आये हुए बलगोविन्द' शब्दका अर्थ गंगराज राचमल्लक मंत्री चामुण्डराय किया है। इलसे प्रतीत होता है कि यह ग्रन्थ राचमल्लके राज्यकालमें लिखा गया है। श्री राचमल्लका राज्यकाल वि. सं. १०४१ तक रहा है अत: गोम्मटसारका रचनाकाल वि. सं. १०३७-१०४१ के बीच रहा प्रतीत होता है।
१. ध. पु. १ से ६। ४. ध. पु. ९ से १२ ।
२. ध. पु. ७/ ५. ध. पु. १३-१४।
३.ध. पु.८| ६. महानन्ध भाग १ से 51