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इसके व्याख्याता हैं कर्त्ता नहीं। इसीप्रकार अनादिकालसे प्रवाहरूपसे चले आए सिद्धान्त वाचकपदोंको अनादि सिद्धान्तपद कहते हैं, जैसे धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि । अपौरुषेय होनेसे सिद्धान्त अनादि है' 1 आगम, सिद्धान्त और प्रवचन ये शब्द एकार्थवाची हैं। अत: द्वादशांग श्रुत भी अनादि सिद्ध है। सभी तीर्थंकरों का केवलज्ञान एकरूप है अत: उसका कार्य दिव्यध्वनि भी एकरूप है, क्योंकि कारणकी विशेषतासे ही कार्य में विशेषता आती है, ऐसा श्री अमृतचन्द्राचार्यने कहा । वह दिव्यध्वनि संक्षिप्त शब्दरचनाओंसे रहित व अनन्त अर्थोंके ज्ञानमें हेतुभूत अनेक चिह्नोंसे संयुक्त बीजपद कहलाती है। १८ भाषा व सात सौ कु (लघु) भाषा स्वरूप द्वादशांगात्मक उन अनेक बीजपदोंका प्ररूपक अर्थकर्ता है तथा बीजपदोंमें लीन अर्थके प्ररूपक द्वादश अंगोंके कर्ता गणधर भट्टारक हैं। अर्थात् बीजपदोंका व्याख्याता ग्रन्थकर्ता कहलाता है। राग-द्वेष-भोहसे युक्त जीव यथोक्त अर्धका प्ररूपक नहीं हो सकता, क्योंकि उसके सत्यवचनके नियमका अभाव है।
यद्यपि द्वादशांगश्रुत प्रवाहरूपसं अनादि और अपौरुषेय है तथापि वर्तमान पंचमकालमें जम्बू द्वीपस्थ भरत क्षेत्रमें अन्तिमतीर्थंकर भगवान् महावीरको युग प्रवर्तन हो रहा है। इस अपेक्षा भगवान महावीर अर्थकर्ता और गौतम गणधर ग्रन्थकर्ता हैं।
इस द्वादशांग अन्तिम दृष्टिवाद अंग है और इसके पाँच भेद हैं- १. परिकर्म २. सूत्र ३. प्रथमानुयोग ४. पूर्वगत ५. चूलिका । इनमें से पूर्वगत १४ प्रकारका है। उनमें से द्वितीय आग्रायणी-पूर्व के सूत्रोंसे ही प्रायः षट्खंडागमके सूत्रोंकी रचना हुई है किन्तु सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिका दृष्टिबाद नामक बारहवें अंगके दूसरे भेद 'सूत्र' से निकली है और गति आगति चूलिका व्याख्याप्रज्ञप्ति नामक पांचवें अंगसे निकली है।
भगवान् महावीर के निर्वाणके पश्चात् ६२ वर्षमें तीन केवली, १०० वर्षमें पाँच श्रुतकेवली, १८३ वर्षमें ग्यारह दसपूर्वी, २२० वर्षमें पाँच ग्यारह अंगधारी और ११८ वर्षमें चार एकांगधारी आचार्य हुए हैं। उसके बाद सभी अंग और पूर्वोका एकदेश ज्ञान आचार्य परम्परासे श्री धरसेनाचार्य को प्राप्त हुआ। धरसेनाचार्यसे पुष्पदन्त व भूतबली आचार्यने प्राप्तकर उन सूत्रोंको लिपिबद्ध करके छहखंडोंमें विभाजित किया । इसीलिए इस ग्रन्थका नाम षट्खण्डागम रखा गया।
दृष्टिवाद नामक बारहवें अंगके चतुर्थभेद पूर्वगतमें उत्पादपूर्व, आग्रायणीपूर्व आदि १४ भेदों में से पाँचवें ज्ञानप्रवादपूर्वके १२ अर्धाधिकार हैं। प्रत्येक अधिकारके बीस-बीस प्राभृत हैं। इस ज्ञानप्रवादनामक ५ वें पूर्वके दसवें वस्तु अधिकारके अन्तर्गत तृतीय पेज्जदोषप्राभृतसे कषायपाहुड़की रचना की गई है।
१. ध. पु. १ पृ. ३४९ ।
२. ध. पु. १ पृ. ७६ /
३. ध. पु. १ पृ. २१ ।
४. “ कारणविशेषात्कार्यविशेषस्यात्रश्यं भावित्वात् (प्र. सा. गा. २५५ टीका)