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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-११६ विशेषार्थ - जैसे एकेन्द्रियजीवके मिथ्यात्वकी उत्कृष्टआबाधा का प्रमाण आवली के असंख्यातवेंभाग से अधिक अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है। इसका भाग मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थिति १ सागरमें देने पर जितना प्रमाण प्राप्त हो वह आबांधाकाण्डक का प्रमाण समझना चाहिए। इस आबाधाकाण्डकको एकेन्द्रियकी आबाधाके भेदों के प्रमाण अर्थात् आवलीके असंख्यातवेंभागसे गुणा करने पर जो लब्ध आवे उसमें से एक घटाकर जो प्रमाण आया उसको मिथ्यात्वकी उत्कृष्टस्थिति एकसागर में से घटाने पर जो लब्ध शेष रहा वह एकेन्द्रियजीवकी मिथ्यात्वसम्बन्धी जघन्यस्थिति है। एकसागरप्रमाणउत्कृष्टस्थिति में से इस जघन्यस्थिति को घटाने पर जो शेष रहा उसमें एकका भाग देने पर उतना ही रहता है। इसमें एक अधिक करने पर एकेन्द्रिय जीव के मिथ्यात्वसम्बन्धी स्थितिभेदों का प्रमाण निकलता है। जघन्यसे एक-एक समय बढ़ते हुए उत्कृष्टपर्यन्त एकेन्द्रियके मिथ्यात्वसम्बन्धी स्थितिभेद जानना। तथैव द्वीन्द्रियजीव के मिथ्यात्वकी उत्कृष्टआबाधाकाप्रमाण यद्यपि एकआवलि को चार बार संख्यातका भाग देने पर जो लब्ध आवे उतने अधिक पचीसअन्तर्मुहूर्त ही हैं, तथापि एकेन्द्रियजीवसम्बन्धी अबाधा के अन्तर्मुहर्त समान ही २५ अन्तर्मुहर्त जानना। अर्थात् एकेन्द्रियजीवसम्बन्धी आबाधा से २५ गुणी द्वीन्द्रिय की आबाधा है तथा २५ गुणा ही कर्मों का स्थितिबन्ध है। इसप्रकार एकेन्द्रियकी अपेक्षा २५ अन्तमुहूर्त है ऐसा ही आगे भी समझना चाहिए। इस आबाधाकालका भाग द्वीन्द्रियके मिथ्यात्वकी उत्कृष्टस्थिति २५ सागर में देने से आबाधाकाण्डका प्रमाण होता है। इस अबाधाकाण्डकसे द्वीन्द्रियसम्बन्धी जो आबाधाकाण्डकके भेद हैं उनके साथ गुणा करने पर जो संख्या प्राप्त हो उसमें से एककम करने पर जो शेष रहे उसको उत्कृष्ट २५ सागरप्रमाणस्थिति में से घटाने पर जो अवशिष्ट रहे उतने प्रमाण द्वीन्द्रियके मिथ्यात्वसम्बन्धी जघन्यस्थितिका बन्ध समझना। इस जघन्य को उत्कृष्ट में से घटा देने से शेष में एक अधिक करने पर द्वीन्द्रियसम्बन्धी मिथ्यात्व की स्थितियों के भेदों का प्रमाण होता है। इसीप्रकार त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय व असञ्जीपञ्चेन्द्रियका भी जानना तथा एकेन्द्रियसे असञीपञ्चेन्द्रियपर्यन्त जीवों के ज्ञानावरणादि अन्यकर्मों की आबाधाके भेदादि जानना चाहिए। अङ्कसन्दृष्टिद्वारा कथन करते हैं - उत्कृष्टस्थिति ६४ समय है और ६३ से लेकर ४६ समयतक मध्यमस्थितिका प्रमाण है। जघन्यस्थितिका प्रमाण ४५ समय है, उत्कृष्टआबाधा काप्रमाण १६ समय है। इस आबाधाका भाग उत्कृष्टस्थिति में देने से ४ आये यह अबाधाकाण्डकका प्रमाण है। ६४५१६ -४ आबाधाकाण्डक । ६४-६३-६२-६१ ... इन चार स्थितिभेदों की | समय की आबाधा ६०-५९-५८-५७ इन चार स्थितिभेदों की समय की आबाधा ५६-५५-५४-५३ इन चार स्थितिभेदों की समय की आबाधा ५२-५१-५०-४९ इन चार स्थितिभेदों की समय की आबाधा ४८-४७-४६-४५ इन चार स्थितिभेदों की समय की आबाधा १६-१५-१४-१३-१२ ये ५ आबाधा के भेद हुए।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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