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* प्रस्तुत नवीन संस्करण *
गोम्मटसार कर्मकाण्ड का यह नवीन संस्करण करणानुयोग के स्वाध्यायियों एवं अध्येताओं के लिए प्रस्तुत करते हुए हार्दिक प्रसन्नता है। दो दशक से भी अधिक समय का अन्तराल हो गया है प्रथम और इस संस्करण में।
इस दुरूह ग्रन्ध का प्रधम सम्पादन इस काल के करणानुयोग के विशिष्ट ज्ञाता, सिद्धान्त-ग्रन्थों के मर्मज्ञ श्रीयुत पं. रतनचन्दजी मुख्तार ने धवला, जयधवला और महाबन्ध आदि से मिलान कर अनेक संदृष्टियों सहित विशेष परिश्रमपूर्वक किया है। इस नवीन संस्करण में भेरा पुरुषार्थं प्रथम संस्करण की मुद्रण सम्बन्धी भूलों के सुधार, भाषा के परिष्कार तथा जहाँ कहीं ऐसा लगा कि विषय थोड़ा और स्पष्ट किया जा सकता है वहाँ अपेक्षानुरूप उसे विशद करने तक ही सीमित रहा है। आशा है, इससे सुधी अध्येताओं को कुछ सुविधा ही रहेगी।
मुख्तार सा, सिद्धान्त-ग्रन्धों के तलस्पर्शी ज्ञाता थे। मात्र स्वाध्याय के बल पर ही उन्होंने यह विशिष्ट क्षमता अर्जित की थी। वे मेधावी और अध्यवसायी दोनों थे। आर्यिका विशुद्धमतीजी द्वारा भाषाटीकाकृत त्रिलोकसार के सम्पादन-काल में मेरा उनका निकट सम्पर्क रहा था। उनका व्यक्तित्व-वचन-लेखनी सब कुछ प्रामाणिक रहा है। मैं उस पुनीत आत्मा के प्रति नतमस्तक हूँ!
ग्रन्थ की टीकाकी पूज्य आर्यिका १०५ आदिमती माताजी ने और पू. आर्यिका श्रुतमती एवं सुबोधमती माताजी ने मुझे इस ग्रन्थ के सम्पादन-प्रकाशन कार्य में संलग्न किया, एतदर्थ मैं आपका अतिशय अनुगृहीत हूँ।
पूज्य आदिमती माताजी सतत ज्ञानागाधना में संलग्न रहती हैं। स्वास्थ्य की प्रतिकूलता होते हुए भी अध्ययन और लेखन से उदासीन नहीं होती। अभी आपने भगवतो आराधना' की हिन्दी टीका लिखी है वह भी शीघ्र प्रकाश्य है। ठीक ही है, जिनवाणी की सेवा में कष्ट सहना तो कर्मनिर्जरा का ही साधन है। आर्यिकाय के चरणों में सविनय बन्दामि ।
प्रथम संस्करण के प्रकाशन के समय पाण्डुलिपि की वावना के प्रमुख थे - आचार्यकल्प १०८ श्री श्रुतसागरजी महाराज | वे वास्तव में यथानाम तथा गुण थे। उन गुरुदेव के मुझ पर अनन्त उपकार हैं।