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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१००
----- इसलिए अपनी आयुकी प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि अष्टमत्रिभागी में आयुकर्म का बन्ध होता है। यदि अष्टमत्रिभागी में भी आयुका बन्ध नहीं हो तो भुज्यमानआयुके अन्त में आयुकर्मका बन्ध होता है, अतः वह सादिबन्ध है तथा अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त ही बँधता है इसका कारण अध्रुव है।
नोट - सामान्य से आयुबन्धके एक अन्तर्मुहूर्त पश्चात् मरण होता है, क्योंकि जघन्य आबाधा भी अन्तर्मुहूर्त है।
विशेषार्थ - गाथा १५८, ९१७ के अनुसार आयुकर्म की जघन्य आबाधा असंक्षेपाद्धा काल प्रमाण है। यह काल आवली के संख्यातवें भाग प्रमाण है इसलिए आयुबन्ध के इतने काल पश्चात् मरण हो सकता है। अब इन बन्धों का लक्षण कहते हैं -
सादी अबंधबंधे सेढिअणारूढगे अणादी हु।
अभवसिद्धम्हि धुवो भवसिद्धे अदुवो बंधो॥१२३ ।। अर्थ - जिसकर्म के बन्धका अभाव होकर वही कर्म पुन: बंधे उसे सादिबन्ध कहते हैं। जो श्रेणीपर नहीं चढ़ा अर्थात् जिसके बन्धका अभाव नहीं हुआ उसके अनादिबन्ध है। जिस बन्ध का कभी अभाव नहीं होगा वह ध्रुवबन्ध है, वह ध्रुवबन्ध अभव्योंके होता है। जिस बन्ध का अन्त आ जावे वह अध्रुव बन्ध है, यह बन्ध भव्योंके होता है।
विशेषार्थ - ज्ञानावरण की ५ प्रकृतियों का बन्ध सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त के जीवको था पीछे वही जीव जब उपशान्तकषायगुणस्थानको प्राप्त हुआ उससमय उसके ज्ञानावरण के बन्ध का अभाव हुआ। वही जीव पुन: उतरते हुए नीचे सूक्ष्मसाम्पराय में आया उस समय उसके जो ज्ञानावरणका बन्ध हुआ वही सादिबन्ध है। जीव जबतक श्रेणी को प्राप्त नहीं होता तबतक उसके अनादिबन्ध जानना। जैसे - ज्ञानावरणकी बन्धव्युच्छित्ति सूक्ष्मसाम्परायके अन्तसमयमें होती है उसके अनन्तर जीव उपशान्तकषाय गुणस्थान में पहुंचा, इसके पहले सूक्ष्मसाम्परायके अन्ततक ज्ञानावरणका अनादिबन्ध
है।
अभव्यजीवों के ध्रुवबन्ध होता है, क्योंकि निष्प्रतिपक्ष-निरन्तरबन्धी कर्म प्रकृतियोंकाबन्ध अभव्यजीवों के अनादि-अनन्त पाया जाता है। भव्यजीवों के अध्रुव-बन्ध है, क्योंकि भव्यजीवों के बन्धका अन्त पाया जाता है। जैसे ज्ञानावरणपञ्चक (मति-श्रुतादि) की बन्धव्युच्छित्ति दशवेंगुणस्थान में होती है। इस प्रकार सादि-अनादि-ध्रुव-अध्रुवका लक्षण कहा।