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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-९९ अनाहारकसम्बन्धी बन्ध-अबन्ध-व्युच्छित्ति की सन्दृष्टि
बन्धयोग्यप्रकृति ११२ गुणस्थान ५। गुणस्थान | बन्ध अबन्ध व्युच्छित्ति विशेष मिथ्यात्व
५ (देवचतुष्क, तीर्थङ्कर) १३ (गुणस्थानोक्त १६
३ नरकद्विक व नरकायु) सासादन | ९४ । १८ । २४ २४ (गुणस्थानोक्त २५-१ तिर्यञ्चायु) असंयत । ७५ । ३७ । ७४ । ३७ (२४+१८-५ देवचतुष्क, तीर्थकर)
७४ (मनुष्यायुबिना असंतकी ९+देशसंयतकी ४५ प्रमत्त की ६+ अपूर्वकरणकी आहारकदिकबिना ३४+अनिवृत्तिकरणकी ५+सूक्ष्मसाम्परायकी १६) ये सर्व ७४ प्रकृतियाँ असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्न
होती हैं।
सयोगी
१(सातावेदनीय) नोट - अनाहारक अवस्था में सातावेदनीयकी बन्धव्युच्छित्ति नहीं होती।
अयोगी
११२
इस प्रकार चतुर्दशमार्गणाओं में बन्ध-अबन्ध और बन्धल्युच्छित्ति कथन पूर्ण हुआ। आगे मूलप्रकृतियों के सादि-अनादि इत्यादिरूप बन्ध के भेदों को विशेषरूप से कहते
सादि अणादी धुव अद्भुवो य बंधो दु कम्मछक्कस्स।
तदियो सादियसेसो अणादिधुवसेसगो आऊ।।१२२ ॥ अर्थ - छहकर्मों का प्रकृतिबन्ध सादि, अनादि, ध्रुव एवं अध्रुवरूप से चारों प्रकार का होता है, किन्तु वेदनीयकर्म का बन्ध सादिबिना तीनप्रकार का होता है। आयुकर्म का अनादि तथा ध्रुवबन्धके बिना दो प्रकार का अर्थात् सादि और अध्रुवबन्ध ही होता है।
विशेषार्थ - वेदनीयका सादिबन्ध नहीं होने से तीनप्रकारका बन्ध होता है, क्योंकि उपशमश्रेणी में आरोहण व अवरोहण करते हुए सातावेदनीयकी अपेक्षा निरन्तर वेदनीयकर्मका बन्ध है अत: सादिपना नहीं है, मात्र अनादि, ध्रुव और अध्रुवबन्ध ही है। एकपर्याय में आयुकी त्रिभागी आठ ही होती है।