SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 133
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१५ प्रथमोपशमसम्यक्त्वसम्बन्धी बन्ध-अबन्ध और व्युच्छित्तिकी सन्दृष्टि बन्धयोग्यप्रकृति ७७ । गुणस्थान असंयतादि चार। गुणस्थान | बन्ध | अबन्ध व्युच्छित्ति | विशेष २ (आहारकद्विक) ९ (गुणस्थानोक्त १०-१ मनुष्यायु) देशसंयत असयत | ७५ प्रमत्त अप्रमत्त | ५८ १९ (१५+६-२ आहारकद्विक) द्वितीयोपशमसम्यक्त्व में भी बन्धयोग्यप्रकृति ७७ हैं। गुणस्थानअसंयतादि आठ हैं।' असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ९, बन्ध प्रकृति ७५, अबन्धप्रकृति २। देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति प्रकृति ४, बन्धप्रकृति ६६ और अबन्धप्रकृति ११ । प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रकृति ६, बन्धप्रकृति ६२ और अबन्धप्रकृति १५ । अप्रमत्तगुणस्थान में न्युच्छिन्न प्रकृति शून्य, आहारकदिकसहित बन्धप्रकृति ५८, अबन्धप्रकृति १९ । अपूर्वकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रकृति ३६, बन्धप्रकृति ५८ और अबन्धप्रकृति १९ हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ५, बन्धप्रकृति ५२, अबन्धप्रकृति ५५ । सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में ज्युच्छित्तिरूप प्रकृति १६, बन्धप्रकृति १७ तथा अबन्धरूप प्रकृति ६० हैं। उपशान्तमोगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति शून्य, बन्धप्रकृति १ एवं अबन्धप्रकृति ७६ है। प्रथम व द्वितीयोपशमसम्यक्त्व में आयुका बन्ध नहीं होता है। शंका - प्रथमोपशम और द्वितीयोपशमसम्यक्त्व में आयुका बन्ध नहीं कहा है तो फिर “श्रेणीपर आरोहण करते हुए अपूर्वकरणगुणस्थान के प्रथमभाग में मरण नहीं होता" यह कथन व्यर्थ समाधान - जिसने पूर्व में देवायु का बन्ध कर लिया है ऐसे सातिशयअप्रमत्तजीव के श्रेणीआरोहण सम्भव है। यहाँ प्रथमोपशमसम्यक्त्व में तथा जिसका काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है ऐसे अपूर्वकरणगुणस्थान के प्रथमभाग में मरण नहीं होता, अन्यत्र उपशमश्रेणी में मरण है। देवायु के बन्धका अभाव उपशमश्रेणी में सर्वत्र ही है। १. उपशमश्रेणी में चढ़ते हुए भी असंयतगुणस्थान में द्वितीयोपशमसम्यक्त्व कहा है, मात्र श्रेणी से उतरने की अपेक्षा ही होता हो ऐसी बात नहीं है देखो - ५. पु. १ सूत्र की टीका। मूलाचार अ. १२ गाथा २०५ की टीका | कार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा ४८४ की टीका।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy