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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१४ १०३ / ० उपशान्तमोह । १ क्षीणमोह सयोगी | १ (सातावेदनीय) १ (सातवेदनीय) १ (सातावेदनीय) १०३ भव्यमार्गणा में बन्धयोग्यप्रकृति १२० । गुणस्थान १४ । यहाँ बन्ध-अबन्ध और व्युच्छित्ति का सर्वकथन गुणस्थानवत् जानना। अभव्यके बन्धयोग्यप्रकृति ११७ हैं, क्योंकि इसके आहारकद्विक और तीर्थङ्करप्रकृति का बन्ध नहीं होता है। गुणस्थान एक मिथ्यात्व ही है। ॥ इति लेश्या व भव्यमार्गणा || अथ सम्यक्त्वमार्गणा इस मार्गणा के ६ भेद हैं - उपशम (प्रथमोपशम-द्वितीयोपशम) सम्यक्त्व, क्षयोपशमसम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व, मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र। प्रथमोपशमसम्यक्त्व में बन्धयोग्यप्रकृति ७७ हैं, क्योंकि मिथ्यात्व व सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्न होने वाली (१६+२५) ४१ प्रकृति तथा देव व मनुष्यायुका यहाँ बन्ध नहीं होता है। “णवरिये सव सम्मे णरसुर आऊण णस्थि णियमेण" (गाथा १२० के) इस वचनके अनुसार (मनुष्यायु, देवायु) की व्युच्छित्ति पहले हुई थी। सम्यग्दृष्टि के तिर्यञ्च और मनुष्यगति में देवायुका तथा नरक व देवगति में मनुष्यायुका बन्ध होता था, किन्तु प्रथमोपशम और द्वितीयोपशमसम्यग्दृष्टि के इन दोनों आयुका भी बन्ध नहीं होता है। प्रथमोपशमसम्यक्त्व में असंयतसे अप्रमत्तपर्यन्तचारगुणस्थान जानना । यहाँ असंयतगुणस्थान में मनुष्यायुबिना व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ९, आहारकद्विकबिना बन्धरूप प्रकृति ७५ तथा अनन्धरूप प्रकृति २ हैं। देशसंयत्तगुणस्थान में व्युच्छित्ति ४ प्रकृतिकी, बन्ध ६६ प्रकृतिका एवं अबन्ध ११ प्रकृतिका है। प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६, बन्धप्रकृति ६२, अबन्धप्रकृति १५। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छित्र-प्रकृति शून्य, आहारकद्विकसहित बन्ध प्रकृति ५८ एवं अबन्धप्रकृति 'उपशमसम्यग्दृष्टिके तीर्थक्करप्रकृतिका बन्ध नहीं होता' ऐसा कोई आचार्य मानते हैं, किन्तु यहाँपर यह विवक्षा नहीं है। उपशमसम्यक्त्वके साथ आहारकदिकका उदय विरुद्ध है, बन्ध विरुद्ध नहीं है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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