SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 129
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-९१ सुक्के सदरचउक्कं वामंतिमबारसं च ण व अत्थि। कम्मेव अणाहारे बंधस्संतो अणंतो य ।।१२१॥ जुम्मं ।। अर्थ - सम्यक्त्वमार्गणा में दोनों ही उपशमसम्यक्त्वी (प्रथमोपशम-द्वितीयोपशम) जीवों के मनुष्यायु और देवायु का बन्ध नहीं है। लेश्यामार्गणामें तेजोलेश्यावाले के मिथ्यात्वगुणस्थान की बन्ध से व्युच्छिन्न अन्तिम ९ प्रकृति तथा पालेश्यावालेके मिथ्यात्वगुणस्थान की अन्तिम १२ प्रकृतियों का बन्ध नियमसे नहीं होता है। शुक्ललेश्यावालोंके शतारचतुष्क और मिथ्यात्वगुणस्थान की अन्तिम १२ इन १६ प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता। आहारमार्गणासम्बन्धी अनाहारकअवस्था में कार्मणकाययोगी के समान व्युच्छित्तिबन्ध-अबन्ध का कथन जानना। विशेषार्थ - तेजोलेश्यामें बन्धयोग्य प्रकृतियाँ १११ हैं। गुणस्थान आदि के सात हैं। मिथ्यात्वगुणस्थान में जिन १६ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है उनमें से अंतिम ९ प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता है, अतः यहाँ आदिकी सात प्रकृतियों का बन्ध होने से उनकी ही व्युच्छित्ति होती है, बन्धप्रकृति १०८ तथा अबन्ध तीनप्रकृतिका है। सासादनसे अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त व्युच्छित्ति और बन्ध तो गुणस्थानवत् जानना, किन्तु अबन्धप्रकृति यथाक्रमसे सासादनादि गुणस्थानों में १०-३७-३४-४४४८ और ५२ जानना । विस्तृत कथन इस प्रकार है – मिथ्यात्वगुणस्थानमें व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ७, बन्धप्रकृति १०८ और अबन्धप्रकृति ३ हैं। सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति २५, बन्धप्रकृति १०१, अबन्धप्रकृति १० हैं। मिश्रगुणस्थानमें व्युच्छित्ति शून्य, बन्धप्रकृति ७४, अबन्धप्रकृति ३७ । असंयतगुणस्थानमें व्युच्छित्तिरूप प्रकृति १०, बन्धप्रकृति ७७ तथा अबन्धप्रकृति ३४ । देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ४, बन्धप्रकृति ६७ तथा अबन्धप्रकृति ४४ हैं। प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६, बन्धप्रकृति ६३, तथा अबन्धप्रकृति ४८ हैं। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति १, बन्धप्रकृति ५९ तथा अबन्धप्रकृति ५२ हैं। तेज (पीत) लेश्यासम्बन्धी बन्ध-अबन्ध व व्युच्छित्तिआदि की सन्दृष्टि बन्धयोग्य प्रकृति १११ । गुणस्थान ७ हैं। गुणस्थान | बन्ध | अबन्ध व्युच्छिति विशेष मिथ्यात्व | १०८ ३ । ७ । ३ (तीर्थकर, आहारकद्विक) ७ (गुणस्थानोक्त १६ में से मिथ्यात्व से आतप पर्यन्त) सासादन [ १०१ | १० | २५ ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy