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________________ ** सम्पादकीय प्रथम संस्करण : घटना आजसे लगभग ४५ वर्ष पूर्वकी है जब सन् १९३५ तदनुसार विक्रमसम्वत् १९९१ में विजगत् के सुप्रसिद्ध विद्वान् स्व. श्री माणिकचन्दजी कौन्देय 'न्यायाचार्य' दसलक्षणपर्वके पावन अवसरपर सहारनपुरमें शास्त्रप्रवचनके लिये आमंत्रित करनेपर पधारे थे। प्रवचन करते हुए उन्होंने तस्वार्थसूत्रकी व्याख्या करते हुए उपशमसम्यग्दर्शनका स्वरूप बताया, किन्तु ज्ञानका अल्पक्षयोपशम होनेके कारण उनके द्वारा आगमानुसार प्रतिपादित उपशमसम्यग्दर्शनका स्वरूप मैं नहीं समझ सका परन्तु इतना अवश्य समझ गया था कि सम्यग्दर्शनकी प्रामिसे ही मेरा आत्महित हो सकता है। शास्त्र - प्रवचन समाप्त होनेके पश्चात् अपनी जिज्ञासाको शांत करनेके लिये मैंने पंडितजीसे पूछा कि प्रथमोपशम-सम्यक्त्वकी प्राप्तिका उपाय और उसका स्वरूप किस ग्रन्थ में है। पंडितजीने मेरे प्रश्नका साहजिक उत्तर देते हुए कहा कि 'लब्धिसार-क्षपणासार' ग्रन्थ में इसकी विस्तृत प्ररूपणा आचार्य श्रीनेमिचन्द्रसिद्धांतचक्रवर्ती ने की है। बस ! क्या था "मानों अंधेको दो आँखें ही मिल गई हों" के अनुसार मैंने अनुभव किया कि जैसे किसी निधिकी ही उपलब्धि हो गई हो । मैंने निर्णय किया कि उक्त ग्रन्थराजका स्वाध्याय करूंगा । उन दिनों सहारनपुर नगरके जैनमन्दिरोंमें मुद्रितशास्त्रोंके स्वाध्यायपर प्रतिबन्ध था मात्र हस्तलिखित शास्त्रोंको पढ़ने की आज्ञा थी और वह शुद्धवस्त्र पहनकर ही पढ़े जा सकते थे। यही कारण था कि सहारनपुर जैसे धर्मप्राण नगर में मुद्रितग्रन्थ उपलब्ध ही नहीं थे। अपने निर्णयके अनुसार मैंने स्व. लाला जम्बूप्रसादजी रईसके निजी शास्त्र भण्डारसे हस्तलिखित 'लब्धिसार-क्षपणासार' प्रति प्राप्तकर स्व. लाला भगवानदासजी द्वारा निर्मापित जिनमन्दिरमें बैठकर प्रातः कालीन शुभ बेलामें स्वाध्याय प्रारम्भ कर दिया। हिन्दी, संस्कृत व प्राकृतभाषासे अनभिज्ञ तथा कर्मप्रकृतियोंके नाम तक भी न जाननेवाले मात्र उर्दू व अंग्रेजी भाषासे भिज्ञ मेरे 'द्वारा 'लब्धिसार-क्षपणासार' जैसे महान् ग्रन्थका स्वाध्याय करनेका साहस करना ऐसे लगा जैसे कोई पावसे लंगड़ा व्यक्ति किसी दुरूह एवं ऊँचे पहाड़पर चढ़ना चाह रहा हो। अपने आपको इसके लिये अयोग्य जानते हुए भी अन्त:करण की प्रबलतम प्रेरणा मिलते रहनेसे निराशाने कभी भी मुझपर अपना साम्राज्य नहीं किया। आशाका दीप सतत मनको दृढ़से दृढ़तम होनेमें प्रकाश प्रदान करता रहा, फलस्वरूप स्वाध्याय प्रारम्भ रहा, क्योंकि आत्महितकी भावना प्रबल थी। प्रथम दिन मैंने पं. प्रवर टोडरमलजी द्वारा लिखित उक्त ग्रन्थसम्बन्धी पीठिकाके प्रथम पृष्ठ को पढ़ा किन्तु एक घण्टेके परिश्रमके बाद भी कुछ समझमें नहीं आया अतः उस दिन स्वाध्याय बन्द कर दिया, क्योंकि वकालतसम्बन्धी कार्य करनेका समय हो गया था। प्रथम दिनके समान ही दूसरे दिन भी पीठिकाके उसी पृष्ठका स्वाध्याय किया किन्तु पूर्वकी अपेक्षा कोई प्रगति नहीं हुई अर्थात् दूसरे दिन भी कुछ समझमें नहीं आया, किन्तु निरन्तर प्रयास करते रहनेसे धीरे-धीरे पीठिकासम्बन्धी विषय स्पष्ट होने लगा और " करत करत अभ्यासके जड़मतिहोत सुजान" उक्ति जीवनमें प्रत्यक्ष अनुभवमें आने लगी ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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