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________________ ५४ / गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४८-४९ स्वस्थान अल्पबहुत्व – प्रथः प्रवृत्तकररण के प्रथम समय में प्रथम खण्ड के जघन्य परिणाम की विशुद्धि सबसे स्तोक है। प्रथम समय के द्वितीय खण्ड के जघन्य परिणाम की विशुद्धि अनन्तगुणी है। तृतीय खण्ड के जघन्य परिणाम की विशुद्धि श्रनन्तगुणी है। प्रथम समय के अन्तिम खण्ड के जघन्य परिणाम की विशुद्धि अनन्तगुणी है, इस स्थान के प्राप्त होने तक इसी प्रकार जानना चाहिए। प्रथम समय में प्रथम खण्ड का उत्कृष्ट परिणाम स्तोक है, उससे वहीं पर द्वितीयखण्ड का उत्कृष्ट परिणाम अनन्तगुरणा है, उससे वहीं पर तीसरे खण्ड का उत्कृष्ट परिणाम अनन्तगुरणा है। इसी प्रकार अन्तिमखण्ड के उत्कृष्ट परिणाम तक अनन्तगुणा क्रम जानना चाहिए। जिस प्रकार प्रथम समय के खण्डों का कथन किया गया है, उसी प्रकार दूसरे समय से लेकर अधःप्रवृत्तकरण के अन्तिम समय तक प्रत्येक खण्ड के प्रति प्राप्त जघन्य और उत्कृष्ट परिणामों का स्वस्थान अल्पबहुत्व का कथन करना चाहिए। स्वस्थान अल्पबहुत्व का कथन समाप्त हुआ' । परस्थान अल्पबहुत्व - अधःप्रवृत्तकरण के प्रथम समय में जघन्यविशुद्धि सबसे स्तोक है । उससे दूसरे समय में जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि प्रथम समय के जघन्य विशुद्धि स्थान से षट्स्थान क्रम से असंख्य विद्युद्धिस्थानों को उल्लंघन कर स्थित हुए दूसरे खण्ड के जघन्यविशुद्धि स्थान का दूसरे समय में जघन्यपना देखा जाता है । जाकर स्थित हुए प्रथम निर्वणाकाण्डक के अन्तिम समय के प्राप्त होने तक इसी क्रम से जघन्यइस प्रकार अन्तर्मुहूर्त ऊपर विशुद्धि प्रतिसमय अनन्तगुणित क्रम से जाती है। प्रथम निर्वणाकाण्डक की चरमसमय की जघन्यविशुद्धि से उसी निर्वर्गराकाण्डक के प्रथम समय की उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि उक्त जघन्यविशुद्धि प्रथम समय के अन्तिमखण्ड की जघन्यविशुद्धि के सदृश है और यह उत्कृष्टविशुद्धि, उक्त अन्तिमखण्ड की उत्कृष्ट विशुद्धि है जो श्रसंख्यात लोक प्रमाण षट्स्थान पतित वृद्धिरूप परिणामस्थानों को उल्लंघन कर अवस्थित है । प्रथम निर्वाकाण्ड के अन्तिम समय की जघन्यविशुद्धि से दूसरे निर्वाकाण्डक के प्रथम समय की जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है अथवा प्रथम निर्वर्गयाकाण्डक के प्रथम समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अर्थात् अन्तिमखण्ड (४२) की उत्कृष्टविशुद्धि से द्वितीय निर्वर्गरणाकाण्डक के प्रथम समय की जघन्यविशुद्धि ( ४३ की ) श्रनन्तगुरणी है, क्योंकि उत्कृष्टविशुद्धि उपने से अवस्थित है और यह जघन्यविशुद्धि अष्टाक स्वरूप है जो उक्त उर्वक से श्रागे है । उससे प्रथम निर्वर्गेणाकाण्डक के द्वितीय समय को उत्कृष्टविशुद्धि ( ४३ की उत्कृष्टविशुद्धि ) अनन्तगुणी है, क्योंकि उक्त जघन्यविशुद्धि द्वितीय समय के प्रतिमखण्ड (४३) के जघन्य परिणाम. स्वरूप है और यह उसी अन्तिमखण्ड (४३) की उत्कृष्टविशुद्धि है जो जघन्य से असंख्यात लोकप्रमाण पदस्थानपतित-वृद्धिस्थानों का उल्लंघन कर अवस्थित है । इस प्रकार इस पद्धति ( रीति ) से अन्तर्मुहूर्त कालप्रमाण एक ( प्रत्येक ) निर्वाकाण्डक को अवस्थित कर उपरिम और अधस्तन जघन्य और उत्कृष्ट परिणामों का अल्पबहुत्व कहना चाहिए। यह सब बहुत्व सभी निर्वर्गराकाण्डकों का क्रम से उल्लंघन कर पुनः द्विरम निर्वगंगा काण्डक के अन्तिम समय की उत्कृष्टविशुद्धि (५३ को उत्कृष्टविशुद्धि ) से श्रधः प्रवृत्तकरण के अन्तिमसमय की १. ज. व.पु. १२ पृ. २४४ । २. ज.ध.पु. १२ पृ. २४५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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