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________________ या ४६.४६ गुगास्थान/५३ __ इस असंघष्टि में अधःप्रवृत्तकरण के अन्तम त काल के १६ समय कल्पित किये गये हैं और प्रसंख्यातलोकप्रमाण कुल परिणामों की संख्या ३०७२ कल्पित करके अनुकृष्टि-रचना की गई जिससे वास्तविक कथन सरलता से समझ में आ जावे। संदृष्टि का आलम्बन लेकर अनुकृष्टिरचना का प्ररूपण किया जाता है-अधःप्रवृत्तकरण में प्रथम समय सम्बन्धी प्रथम खण्ड के परिणाम (३६ से ५४) उपरिम समय सम्बन्धी परिणामों में से किन्हीं भी परिणामों के सण नहीं होते हैं। वहीं पर दूसरे खण्ड के परिणाम (४०) सिरे समय के प्रथमखण्ड के परिणामों के समान होते हैं । इसी प्रथम समय के तीसरे आदि खण्डों के परिणामों का भी तृतीय आदि समयों के प्रथम खण्ड के परिणामों के साथ कम से पुनरुक्तपना तब जानना चाहिए जब तक कि प्रथम समय सम्बन्धी अन्तिम खण्ड के परिणाम प्रथम निर्वगंणाकाण्डक के अन्तिम समय के प्रथमखण्ड सम्बन्धी परिणामों के साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते हैं। इसी प्रकार अध:प्रवृत्तकरण के द्वितीयादि समयों के परिणामखण्डों को भी पृथक-पृथक विवक्षित कर यहाँ के द्वितीयादि खण्डगत परिणामों का विवक्षित समय से अनन्तर उपरिम समय से लेकर ऊपर एक समय कम निर्वर्गणा काण्डक प्रमारण समयपंक्तियों के प्रथमखण्ड के परिणामों के साथ पुनरुक्तपनेका कथन करना चाहिए। जले द्वितीय समय का द्वितीयखण्ड (४१) तृतीय समय के अपमखण्ड (४१) के समान है। इतनी विशेषता है कि सर्वत्र प्रथम खण्ड के परिणाम अपुनरुक्त होते हैं। अर्थात् प्रत्येक समय के प्रथम खण्ड के परिणाम अगले समय के किसी भी खण्ड के परिणामसरश नहीं होते । इसी प्रकार द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डक के परिणामस्खण्डों का तृतीय निवर्गणाकाण्डक के परिणामखण्डों के साथ पुनरुक्तपना होता है, किन्तु यहाँ पर भी प्रथम खण्ड के परिणाम अपुनरुक्त होते हैं। तृतीय, चतुर्थ, पंचम आदि निर्बर्गरणाकाण्डकों के खण्डों के परिणाम अनन्तर उपरिम निर्वर्गणाकाण्डकों के खण्ड-परिणामों के साथ पुनरुक्त होते हैं। इसी प्रकार यह क्रम द्विचरम निर्वर्गणाकाण्डक के प्रथमादि समयों के प्रथमखण्ड को छोड़कर शेष सभी परिणामखण्ड अन्तिम निर्वर्गरणाकाण्डक के परिणामों के साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होता है । अन्तिम निर्वर्गरणाकाण्डक के परिणामों के स्वस्थान में पुनरुक्त-अपुनस्तपने का अनुसन्धान परमागम के अविरोध पूर्वक करना चाहिए. जो इस प्रकार है अन्तिम निर्वर्गणाकाण्डक के प्रथम समय का प्रथमखण्ड ऊपर के समय के किसी खण्ड के सहश नहीं है। प्रथम समय का द्वितीय स्खण्ड और दूसरे समय का प्रथम खण्ड परस्पर सरश हैं। प्रथम समय का तृतीय खण्ड और द्वितीय समय का द्वितीयखण्ड ये दोनों सदृश हैं। इसी प्रकार जाकर पुन: प्रथम समय का अन्तिमखण्ड और द्वितीय समय का टिचरम खण्ड ये दोनों सदृश हैं । इसी प्रकार अन्तिम निर्वर्गणाकाण्डक के द्वितीय समय के परिणामखण्डों का और तृतीय समय के परिणामखण्डों का सन्निकर्ष करना चाहिए। इसी प्रकार ऊपर भी पिछले का तदनन्तर के साथ सत्रिकर्ष करना चाहिए। इस प्रकार अधःप्रवृत्तकरण में अनुकृष्टि प्ररूपणा समाप्त हुई। - अधःकरण के खण्डों के परिणामों की विशुद्धि की अपेक्षा अल्पबहुत्व का कथन किया जाता है। स्वस्थान और परस्थान के भेद से अल्पबहुत्व दो प्रकार का है। १. ज.ध.पु. १२ पृ. २४१ अन्तिम अनुच्छेद । २. ज.ध.पु. १२ पृ. २४०-२४२ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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