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वाया ४-४९
गुणस्पान/५१
प्रधःप्रवृत्तकरण के परिणामों को अनुकृष्टि-रचना की कल्पित अङ्क-संदृष्टि
समय, की | परिणामी का क्रम संख्या ।
प्रसारण
प्रथमखण्ड
द्वितीयखण्ड | तृतीयखण्ड । द्वितीय खण्ड
चतुर्भखण्ड
२२२
२१८
काण्डक अन्तिम निर्वगंगा
२१४
-
२१०
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-
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१६४
काण्डक विचरम निवर्गणा । द्वितीय निवंगणा ।
काण्डक
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-
-
१८२
१५४
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काण्डक प्रथम निवर्गणा
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१. सुशीला उपन्यास (स्व. पं. गोपालदासजी बरया) पर्व १६ पृ. २१०-११ पर इसी संदृष्टि को निम्न प्रकार से विशिष्ट स्पष्टीकरण के साथ प्रस्तुत किया गया है
[पृष्ठ ५२ पर देखें