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________________ ४८/मो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४५-४६ निरन्तर ध्यान में रत हैं उनके क्रिया का प्रभाव होने से परिहारविशुद्धिसंयम सम्भव नहीं है । कहा भी है "जिसकी प्रात्मा ध्यानरूपी अमृत के सागर में निमग्न है, जो बचन-यम (मौन) का पालन करता है कौर सिसने नया मीर-सम्बन्धी सम्पूर्ण व्यापार संकुचित कर लिया है, ऐसे जीव के शुभाशुभ क्रियाओं का परिहार बन ही नहीं सकता, क्योंकि गमनागमन प्रादि क्रियात्रों में प्रवृत्ति करने वाला हो परिहार कर सकता है, प्रवृत्ति नहीं करने वाला नहीं। इसलिए ऊपर के ध्यानावस्था को प्राप्त गुणस्थानों में परिहारविशुद्धिसंयम नहीं बन सकता" ।। ४७वीं गाथा का शेष विशेषार्थ:-सातिशय अप्रमत्त गुणस्थान में स्थिति काण्डकघात व अनुभागकाण्डकघात न होने के कारण अनुपशामक और अक्षपक विशेषण दिया गया है। द्वितीयोपशम-सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्धी चतुष्क का विसंयोजन हो जाने से और दर्शनमोह की तीन प्रकृतियों का उपशम हो जाने से अथवा क्षायिक सम्यग्दृष्टि के इन सात प्रकृतियों का क्षय हो जाने से चारित्रमोहनीय कर्म की २१ प्रकृतियां शेष रह जाती हैं, जिनका उपशम या क्षय करने के लिए अध करण, अपुर्वकरण व अनिवृत्तिकरण ये तीन करण होते हैं। इन तीन करणों में से अपूर्वकरण तो पाठवें गुणस्थान में होता है और अनिवृत्तिकरण नौवें गुणस्थान में होता है। अधःकरण नामक कोई गुणस्थान नहीं है प्रतः प्रथम अधःकरण सातिशय अप्रमत्तगुणस्थान में होता है। इस सातिशय अप्रमत्तगुरणस्थान में अधःकरण द्वारा प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धि बढ़ती है, अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग बन्न अनन्तगुणा-अनन्तगुणाहीन विस्थानिक होता है और प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभागबन्ध अनन्तगुणा-अनन्तगुणा वृद्धिगत होता हुया चतु:स्थानिक होता है। प्रत्येक बन्धापसरण द्वारा स्थितिबन्ध घटता हुआ होता है। ये चार आवश्यक कार्य अधःकरण से प्रारम्भ हो जाते हैं । • प्रथमकरण की अनःप्रवृतकरण संजा का कारण • उसके काल एवं उसमें होने वाले परिणामों का प्रमाण जमा उवरिमभावा हेडिमभावेहि सरिसगा होति । तमा पढम करणं प्रधापवत्तोत्ति सिद्दिठं ॥४॥ अंतोमहत्तमेत्तो तक्कालो होदि तत्थ परिणामा । लोगारणमसंखमिदा उवरुरि सरिसवड्ढिगया ॥४६॥ गाथार्थ-अधःप्रवृत्तकरण के काल में ऊपर के समयवर्ती जीवों के परिणाम नीचे के समयवों जीवों के परिणाम के सण अर्थात संख्या और विशुद्धि की अपेक्षा समान होते हैं, इसलिए प्रथमकरण को अध:प्रवत्तकरण कहा गया है ।।४८1। इस अधःप्रवृत्त करण का काल अन्तम हर्त प्रमाण है और इसके परिणामों की संख्या असंख्यातलोक प्रमाण है। ये परिणाम ऊपर-ऊपर समान वृद्धि को प्राप्त होते गये हैं ।।४।। विशेषार्थ-जिस परिणाम विशेष के द्वारा उपशमादिरूप विवक्षित भाव उत्पन्न किया जाता है, वह परिणाम 'करण' कहलाता है। जिस करणा में विद्यमान जीव के करणरूप परिणाम अर्थात १. प. पु. १ पृ. ३७५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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