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________________ ७३६ / गो. सा. जीवकाण्ड जो उपयोग निराकार है, वह दर्शनोपयोग है, क्योंकि वह श्राकार से रहित है। शंका- प्रकार किसे कहते हैं ? समाधान-कर्म-कर्तृ भाव का नाम ग्राकार है। उस ग्राकार के साथ जो उपयोग रहता है, उसका नाम साकार हैं । ' प्रमाण से भूत कर्म को प्राकार कहते हैं अर्थात् प्रमाण में अपने से भिन्न बहिर्भूत जो विषय प्रतिभासमान होता है, उसे श्राकार कहते हैं। वह प्राकार जिस उपयोग में नहीं पाया जाता है, वह उपयोग अनाकार अर्थात् दर्शनोपयोग कहलाता है। शंका- बिजली के प्रकाश से पूर्वदिशा, देश और आकार से युक्त जो सत्ता का ग्रहण होता है, वह ज्ञानोपयोग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसमें विशेष पदार्थ का ग्रहण नहीं पाया जाता । गाथा ६७६ समाधान नहीं क्योंकि वहाँ पर ज्ञान से पृथग्भूत कर्म पाया जाता है, इसलिए वह भी ज्ञान ही है। वहाँ पर दिशा, देश, थाकार और वर्ण आदि विशेषों से युक्त सत्ता का ग्रहण पाया जाता है । - अन्तरंग को विषय करने वाले उपयोग को अनाकार उपयोग रूप से स्वीकार किया है। अन्तरंग उपयोग विषयाकार होता है, यह बात भी नहीं है, क्योंकि इसमें कर्ता रूप द्रव्य से पृथग्भूत कर्म नहीं पाया जाता | अन्तरंग उपयोग को दर्शनोपयोग कहते हैं। कारण यह कि आकार का अर्थ 'कर्मकर्तृत्व' है, उसके बिना जो ग्रर्थोपलब्धि होती है, उसे अनाकार - उपयोग कहा जाता है। अन्तरंग उपयोग में कर्म-कर्तृत्व होता है, ऐसी श्राशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसमें कर्ता की अपेक्षा द्रव्य व क्षेत्र से स्पष्ट कर्म का अभाव है । * उपयोग अधिकार में जीवों की संख्या गाणुवजोग जुदाणं परिमाणं गाणमग्गणं व हवे । दंसणुवजोगियाणं दंसणमग्गरण व उत्तकमो ॥ ६७६ ॥ गाथार्थ -- ज्ञानोपयोग वाले जीवों का प्रमाण ज्ञानमार्गरणा वाले जीवों की तरह समझना चाहिए और दर्शनोपयोग वालों का प्रमाण दर्शनमार्गणा वालों की तरह समझना चाहिए ।। ६७६ ॥ विशेषार्थ - ज्ञानमार्गणा के अनुसार मति अज्ञानी और श्रुत- अज्ञानियों का प्रमाण नपुंसकवेदियों के समान ग्रनन्त है जो अनन्तानन्त श्रवसर्पिणी उत्सर्पिणियों से अपहृत नहीं होते हैं अर्थात् मध्यम अनन्तानन्त हैं । विभंगज्ञानी देवों से कुछ अधिक हैं अर्थात् साधिक दो सौ छप्पन अंगुलों के वर्ग का जगत्तर में भाग देने पर देव विभंगज्ञानियों का प्रमाण होता है, इसमें तीन गतियों के विभंगज्ञानियों का प्रमारग जोड़ने पर समस्त विभंगज्ञानियों का प्रमाण होता है । मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी पत्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं अर्थात् प्रावली के असंख्यातवें १. धवल पु. १३ पृ. २०७ । २. जयधवल पु. १ पृ. ३३१ । ३. जमघवल पू. १ पृ. ३३८ । ४. धवल पु. १३ पृ. २०७ २०८ । ५. धवल पु. ११ पृ. २३३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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