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________________ गाँव। ६६७-६६८ श्राहारमार्गमा ७२६ में कपाट रूप समुद्घात करते हैं। तृतीय समय में प्रतर रूप और चौथे समय में लोकपूरण समुद्घात करते हैं। पाँचवें समय में वे सयोगिजिन लोक के विवरगत आत्मप्रदेशों का संवरण (संकोच) करते हैं। पुनः छठे समय में मन्धान ( प्रतर ) गत श्रात्मप्रदेशों का संवरण करते हैं। सातवें समय में कपाटगत आत्मप्रदेशों का संवरण करते हैं और आठवें समय में दण्ड समुद्घातगत प्रात्मप्रदेशों का संवरण करते हैं । दण्ड-द्विक दोनों दण्ड समुद्घातों में श्रदारिक काययोग होता है । कपाटयुगल में अर्थात् विस्तार और संवररण गत दोनों कपाट समुद्घातों में प्रौदारिक मिश्र काययोग होता है । शेष समयों में अर्थात् तीसरे, चौथे और पाँचवें समय में कार्मण काययोग होता है और उन तीन समयों में केवली भगवान अनाहारक रहते हैं । शंका- केवलियों के समुद्घात सहेतुक होता है या निर्हेतुक ? निर्हेतुक होता है यह दूसरा विकल्प तो बन नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर सभी केवलियों को समुद्घात करने के अनन्तर ही मोक्ष प्राप्ति का प्रसंग प्राप्त हो जायेगा । यदि यह कहा जाय कि सभी केवली समुद्घात पूर्वक ही मोक्ष जाते हैं, ऐसा मान लिया जावे, इसमें क्या हानि है ? सो भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर लोकपूर्ण समुद्घात करने वाले केवलियों की वर्षपृथक्त्व के अनन्तर बीस संख्या होती है, यह नियम नहीं बन सकता है । केवलिसमुद्घात सहेतुक होता है, यह प्रथम पक्ष भी नहीं क्योंकि केवली समुद्धात का कोई हेतु नहीं पाया जाता। यदि कहा जावे कि तीन अघातिया कर्मों की स्थिति आयु कर्म की स्थिति से अधिक है, यह कारण है, सो भी ठीक नहीं, क्योंकि क्षीण कृपाय के तम समय में सर्व कर्मों की स्थिति समान न होने से सभी केवलियों के समुद्घात का प्रसंग ग्रा जायेगा ।" बनता, समाधान -- यतिवृषभाचार्य के उपदेशानुसार क्षीणकषाय गुणस्थान के चरम समय में सम्पूर्ण किम की स्थिति समान नहीं होने से सभी केवन्नी समुदात करके ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं। परन्तु जिन आचार्यों के मतानुसार लोकपूरण समुद्घात करने वाले केवलियों की बीस संख्या का नियम है, उनके मतानुसार कितने ही केवली समुद्घात करते हैं और कितने ही नहीं करते हैं । शंका कौनसे केवली समुद्घात नहीं करते हैं ? समाधान - जिनकी संसार व्यक्ति अर्थात् संसार में रहने का काल वेदनीय आदि तीन कर्मों की स्थिति के समान है, वे समुद्घात नहीं करते हैं, शेष केवली करते हैं । शंका- निवृत्ति आदि परिणामों के समान रहने पर संसारव्यक्ति स्थिति और शेष तीन कर्मों की स्थितियों में विषमता क्यों रहती है ? समाधान- नहीं, क्योंकि संसार की व्यक्ति और कर्मस्थिति के घात के कारणभूत अनिवृत्तिरूप परिणामों के समान रहने पर संसार को उसके अर्थात तीन कर्मों की स्थिति के समान मान लेने में विरोध आता है । शंका- संसार- विच्छेद का क्या कारण है ? १. धवल पु. १ पृ. ३०१-३०२ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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