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________________ ६६८/गो. सा. जीवकाण्ड माथा ६३४-६४१ काल असंख्यातगुणा है । इससे उन्हीं के सन्यग्मिथ्याप्टियों का प्रवहारकाल असंख्यात गुणा है । इससे उन्हीं के सासादन सम्यम्दष्टि का अवहार काल संख्यातगुरगा है । इससे उन्हीं के संयतासंयत का अवहारकाल असंख्यातगृणा है ।' तिथंच संयत्तासंयतों के अवहार काल से प्रथम नरक पृथिवी के असंयत सम्यग्दृष्टियों का अवहारकाल असंख्यात गुगा है। इससे उन्हीं के सम्यग्मिथ्याष्टि का अबहारकाल असंख्यातगुणा है। इससे उन्हीं के सासादन सम्यग्दृष्टि का अवहार काल संख्यात गृणा है । इसी प्रकार दूसरी पृथिवी से लेकर सातवीं नरक पृथिवी तक ले जाना चाहिए । सातवीं पृथिवी के सासादन सम्यग्दृष्टि प्रवहार काल से प्रानत-प्राणत के असंयत सम्यम्दृष्टियों का अवहारकाल असंख्यात गुरणा है, क्योंकि शुभ कर्म वाले दीर्घायु जीव बहुत नहीं होते। इस अवहार काल को संख्यात से गुणित करने पर मारण-अच्युत कल्पवासी असंयत सम्यग्दृष्टियों का अवहारकाल होता है, क्योंकि उपरिम-उपरिम कल्पों में उत्पन्न होने वाले शुभ कर्मों की अधिकता से दीर्घायूवाले जीवों से नीचे-नीचे के कल्पों में स्तोक पुण्य से स्तोक भवस्थिति में उत्पन्न होने वाले जीव अधिक पाये जाते हैं 1 नीचे-नीचे अधिक जीव होते हुए भी वे संख्यात गुणे ही होते हैं। क्योंकि ऊपर के कल्पों में उत्पन्न होने वाले जीवों के लिए मनुष्यराशि बीजभूत है और मनुष्यराशि संख्यात ही होती है अतः ऊपर-ऊपर के कल्पों से नीचे के कल्पों में जीव संख्यातगुणे हैं । यहाँ पर गुणकार संख्यात समय है । यही क्रम उपरिम-उपरिम वेयक के असंयत सम्याष्टि अबहार काल तक लेजाना चाहिए। उपरिम-उपरिम वेयक के असंयत सम्यग्दष्ट अवहारकाल से ग्रामत-प्रागत के मिथ्या दृष्टियों का अवहार-काल संख्यातगुणा है। इससे पारण अच्युत के मिथ्यारष्टियों का प्रवहारकाल संख्यातगुरगा है। इसी प्रकार उपरिम-उपरिम (अन्तिम) ग्रेवे तक लेजाना चाहिए । उपरिम-उपरिभ ग्रंवेयक के मिथ्यादष्टि अवहारकाल से अनुदिश के असंयत सम्यग्दृष्टियों का अवहारकाल संख्यातगुणा है। इससे विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित इन अनुत्तरवासी देवों का असंयत सम्यग्दृष्टि-प्रबहारकाल संख्यातगुणा है यहाँ पर भी सर्वत्र गुणकार संख्यात समय है। इससे अानतप्राणत सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का असंख्यात गुणा है, गुरगकार आपली का असंन्यातवाँ भाग है। इससे पारण-अच्युत के सम्यग्मिथ्याष्टियों का अबहार काल संख्यातगुणा है । इसी प्रकार उपरिम-उपरिम (अन्तिम) वेयक पर्यन्त लेजाना चाहिए । उपरिम-उपरिम ग्रंवेयक के सम्यग्मिथ्याष्टि अवहारकाल से पानत-प्रारणत के सासादन सम्यग्दृष्टि का अवहार काल संख्यातगुणा है। इससे प्राररण-अच्युत सासादन-सम्यग्दृष्टियों का प्रबहारकाल संख्यात गुणा है। इसी प्रकार उपरिम-उपरिम वेयक पर्यन्त लेजाना चाहिए। सर्वत्र गुणकार संन्यात समय है । उपरिम-उपरिम (अन्तिम) अदेयक मासादन अवहार काल से उन्हीं का द्रव्य प्रमाण असण्यात गमा है, क्योंकि अवहारकाल से पल्योपम को खण्डित करने पर द्रव्यप्रमाण प्राप्त होता है। इस द्रव्यप्रमाण से उपरिम मध्यम अवेयक के सासादन सम्यग्दृष्टियों का द्रव्य संख्यात गुणा है। इस प्रकार अवहारकाल के प्रतिलोम क्रम से जब तक सौधर्म और ऐशान कल्प के असंयतसम्यग्दृष्टियों का द्रव्य प्राप्त हो तब तक ले जाना चाहिए । सौधर्म हिक के असंयन सम्यग्दृष्टि द्रव्य से पल्योरम असंख्यातगृणा है। अपना अवहारकाल गुगणकार है। १. धवल पु. ३ पृ. २६८-२६६ । २. धवल पु. ३ पृ. २६६ ॥ ३. धवल पृ. ३ पृ. २६६। ४. श्रवल पु. ३ पृ. २८३ । ५. धवल पु.३ पृ. २६६ । ६ धवल पु.३ पृ. ३००। ७. धवल पु. ३ पृ. २६९ व ३०० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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