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________________ गाथा ६३४-६४० सभ्यत्रन्त्रमागंसर / ६६५ ( प्रमत्तसंयत गुणस्थान वाले जीव ४६६६६६६४ + अप्रमत्त संयत सातवे गुणस्थान बाले २२७६६४६८ + चारों उपशमक-पांचों क्षपक केवली ५३३०३४ ६६६६६६६६ सत्र संगत होते हैं ।) छक्कादी छक्ता छण्णवमज्झा य संजदा सन्वे । तिगभजिदा विगगुरिगदापमत्तरासी पत्ता दु ५६ ।।' -- जिस संख्या के श्रादि में यह अन्त में छह और मध्य में छह बार नी है (६६६६६६६ ) उतने सम्पूर्ण संयत है । इसमें तीन का भाग देने पर अप्रमत्तसंयत ( सातवें गुणस्थान, १४वे गुणस्थान. 3 तक) जीव होते हैं। और इस तीसरे भाग को दो से गुणा करने पर प्रमत्तसंयत छटे गुणस्थानवर्ती जीव होते हैं। ( ६६६६६६६६ ÷ ३ २३३३३३३२ सर्व अप्रमत्त संवत २३३३३३३२x२= ४६६६६६६४ प्रमन्नसंयत जीब होते हैं। यह उत्तर मान्यता के अनुसार कथन है । ) इस प्रकार उत्तर व दक्षिण मान्यताओंों में परस्पर भेद है। चारों गतियों के प्रथम चार गुणस्थानों सम्बन्धी अवहार काल अर्थात् भागद्दार का तथा परस्पर अल्पबहुत्व का कथन घासंजय मिस्स सासर सम्मारण भागहारा जे । रूऊरणावलियासंखेज्जेरिगह भजिय तत्थ शिक्खिते ॥ ६३४ || देवाणं श्रवहारा होंति असंखेण तारिए प्रवहरिय | तत्थेव य पक्खित्ते सोहम्मीसाग श्रवहारा ॥। ६३५ ।। सोहम्मसारणहारमसंखेर य गुरवे । उवरि श्रसंजद मिस्तय- सासरा सम्मारण श्रवहारा ।। ६३६ ।। सोहम्मादासारं जोइसि वरण- भवरण- लिरिय पुढवीसु । अविरद - मिस्से संखं संखासंखगुण सासणे देसे ।। ६३७ ।। चरमधरासारगहरा ग्रारणव- सम्मारण प्रारणापहृदि । अंतिम गेवेच्चतं सम्मारमसंख संख - गुरणहारा ।।६३८ ॥ तत्तो ताणुत्ताणं वामागमणुद्दिसारण विजयादि । सम्माणं संखगुणो श्रारगद मिस्से असंखगुणो ।।६३६।। तत्तो संखेज्जगुण सासरसम्माण होदि संखगुणो । उताणे कमसो परस्त्तच दुरसंदिट्ठी ।।६४० ॥ १. धवल ए ३ पृ. १०१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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