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माथ। ५६४-५६५
सम्पवमार्गरगा।६६१
लोकाका प प्रमाण है और लोकाकाश में सर्वत्र व्याप रहा है अतः बह चलायमान नहीं होता किन्तु उसमें पुद्गल परमाणु पाते-जाते रहते हैं, इस अपेक्षा से वह चल है। इसीलिए महास्कन्ध को चलाचन्न (चल-अचल ) कर कहा है। यही अवस्था पंचमेरु व अकृत्रिम चैत्यालय प्रादि की है अर्थात् वे भी चल-अचल रूप हैं, क्योंकि वे अनादि-निधन हैं।
___पृद्गल परमाणु यद्यपि एकप्रदेशी है, तथापि उममें क्षेत्र से क्षेत्रान्तर म्प गमनक्रिया होती रहती है तथा कभी बन्ध को प्राप्त होकर स्कन्ध रूप परिणम जाता है, भेद होकर पुनः परमाणु हो जाता है। इस प्रकार पुद्गल परमाणु सक्रिय है। खादिसान्त पुदगल स्कन्ध क्षेत्र से क्षेत्रान्तर होते रहते हैं और उनमें भी भेद से, संघात से तथा युगपत् भेद व संघात से क्रिया होती रहती है इसलिए वे भी चलायमान है। इस प्रकार पुद्गल सक्रिय अर्थात् चल हैं किन्तु अनादि, अनन्त अकृत्रिम मेरु चैत्यालय पर्वत आदि व महास्कन्ध चल-अचल रूप हैं, क्योंकि वे क्षेत्र से क्षेत्रान्तर नहीं होते।
पुद्गल की २३ वर्गों के नाम अणुसंखासंखेज्जारणंता य अगेज्जगेहि अंतरिया । पाहारतेजभासामरणकम्मइया ध्रुषक्खंधा ॥५६४॥ सांतररिणरंतरेरग य सुण्णा पत्लेयदेहधुव-सुण्णा ।
बादरणिगोदसुण्णा सुहमणिगोदा पभो महक्खंधा ।।५६५॥" गाथार्थ-अणु बर्गणा, संख्याताणु वर्गणा, असंख्याताणु वर्गणा, अनन्ताणु वर्गणा, आहार वर्गणा, अनाह्य वर्गरणा, तंजसवर्गगा, अग्राह्य बर्गरणा, भाषा वर्गणा, अग्राह्य वर्गणा, मनोवरणा, अग्राह्य वर्गगगा, कामगा वर्गणा, श्रव वर्गणा, सान्त रनिरन्तर वर्गणा, शून्य वर्गरणा, प्रत्येक शरीर वर्गणा, ध्र व शुन्य वर्गगणाबादर निगोद वर्गगा, शून्य बर्गणा, सूक्ष्मनिगोद वर्गगणा, शून्य वर्गा, महास्कन्ध वर्गणा ।। ५.६४-५.६५।।
विशेषार्थ - 'ग्रणु वर्गणा' यह संक्षेप में नाम है, इसका पूरा नाम 'एकप्रदेशी परमाणु पृद्गल द्रव्य वर्गणा' है।
शंका-परमाणु युद्गल म.प है, यह कैसे सिद्ध होता है ?
समाधान -- उसमें अन्य पुद्गलों के साथ मिलने की शक्ति है, इसलिए सिद्ध होता है कि परमाणु पुद्गल रूप है।
शंका परमाणु सदाकाल परमाणुरूप से अवस्थिन नहीं रहते, इसलिए उनमें द्रव्यपना नहीं बनता ?
१. "नामा: ।" [तस्वार्थसूत्र ५:११] । २. “भेदादणुः ॥२।।" तत्वार्थमुत्र 'प्र. ५]। ३. "भेवसंत्रातेभ्यः उत्पद्यन्ते ।।२६।" [तत्त्वार्थसूत्र अ. ५] ४. 'सुहमा सुशा ग्रह पाठ धवल पु. १४ पृ. ११७ गाथा ८ में है। ५. धवल पु. १४ पृ. ११७ गा. ७ व ८ किन्न गाथा : प्रथर्थात् ५६४ में पुधि इस प्रकार है--"अणुसंखा संखेज्जा तवता वग्गणा यगेजभाम्रो।"