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गाथा ५८०
मम्यक्त्वमार्गगगा/६४९
कालोविय यवएसो सम्भावपरूवो हयदि रिगच्चो ।
उप्पापसी प्रवरी दीहतरदाई ॥५८०।।' गाथार्थ--'काल' यह व्यपदेश निश्चयकाल के सद्भाव का प्ररूपक है और वह निश्चयकालद्रव्य अविनाशी होता है। अवर अर्थात् व्यवहारकाल उत्पन्नध्वंसी है तथा दीर्घान्तर-स्थायी है। अर्थात् दीर्घकाल तक स्थायी है ।।५८०॥
विशेषार्थ-परमार्थकाल अर्थात् निश्चय काल में 'काल' यह संज्ञा मुख्य है और भूत प्रादिक व्यपदेश गौण हैं। तथा व्यवहार काल में भूतादि संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है, क्योंकि इस प्रकार का व्यवहार क्रिया वाले द्रव्यों की अपेक्षा होता है तथा काल का कार्य है।
पर्याय का लक्षण उत्पन्न व नाश होना है। 'समय' नामक व्यवहारकाल भी उत्पन्न व नष्ट होता है, इसलिए पर्याय है। पर्याय द्रव्य के बिना नहीं होती। कहा भी है
'पज्जयविजुवं दवं दश्वविजुत्ता य पज्जया गस्थि ।
दोहं प्रणरणभूवं भावं समणा पर विति ।।१२॥" [पंचास्तिकाय] - पर्यायों से रहित द्रव्य और द्रव्य रहित पर्याय नहीं होती, दोनों का अनन्य भाव है। इसलिए समय आदि पर्याय रूप व्यवहार काल का द्रव्य निश्चयकाल है। वह व्यवहार काल पल्य, सागर आदि रूप से दीर्घकाल तक स्थायी है अर्थात् रहने वाला है और काल द्रव्य अर्थात् निश्चयकान्य अनादि अनन्त होने से नित्य है, अर्थात् अविनाशी है ।
कालो परिणामभवो परिणामो दख्वकालसंभूरो।
वोह एस सहायो कालो खणभंगुरो रिणयदो ॥२॥[धवल पु. ४ पृ. ३१५] - व्यवहार काल पुद्गलों के परिणमन से उत्पन्न होता है और पुद्गल आदि का परिणमन द्रव्यकाल के द्वारा होता है, दोनों का ऐसा स्वभाव है। वह व्यवहार काल क्षणभंगुर है परन्तु निश्चयकाल नियत अर्थात् अविनाशी है ।
वह निश्चयकाल अर्थात् द्रव्यकाल दो प्रकार के गंध, पाँच प्रकार के रस, पाठ प्रकार के स्पर्श और पाँच प्रकार के वर्ण से रहित है, कुम्भकार के चक्र की अधस्तन शिला या कील के समान है, वर्तना ही जिसका लक्षण है और जो लोकाकाश प्रमाण है अर्थात् जितने लोकाकाश के प्रदेश हैं उतने ही काल द्रव्य अर्थात् कालाणु हैं । कहा भी है --
वववपणवारसो ववगददोगंध अफासा य । अगुरुलहुगो प्रमुत्तो वट्टलक्खो य कालो ति ॥२४॥ [पंचास्तिकाय]
१. धवल पु. ४ पृ. ३१५ गा, १ । २. स. सि. ५/२२ । ३. "पर्यायस्योत्पन्नप्रज्वसित्वात् । तथा चोक्त समयो उप्पण्या पद्धसी। स च पर्यायो द्रव्य विना न भवति" [वृहद द्रव्य संग्रह गाथा २१ को टीका]1 ४. "केवचिरं कालो ? प्रणादियो अपज्जवसिदो।" [घवल पु. ४ पृ. ३२१]। ५. धवल पु. ४ पृ. ३१४ व ३१५]