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५६०/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ५१८
न हो तो असंक्षेपाद्धा काल प्रमाण प्रायु शेष रह जाने पर परभविक आयु का अवश्य बन्ध होता है । क्योंकि परभव की प्रायु बन्ध हुए बिना मरण नहीं होता।
__जघन्य विश्रमणकाल युक्त जघन्य प्रायुबन्ध काल असंक्षेपाढा कहलाता है। वह यवमध्य के अन्तिम समय से लेकर जघन्य आयुबन्धकाल के अन्तिम समय तक होता है। यह प्रसंक्षेपाद्धा तृतीय विभाग में ही होता है, क्योंकि अभी भी ऊपर क्षुल्लक भवग्रहण सम्भव है। आयुबन्ध के होने पर ऊपर जो सबसे जघन्य विश्रमण काल है उसकी क्षुल्लक भवग्रहण संज्ञा है। वह अायुबन्ध काल के ऊपर होता है। (धवल पु. १४ पृ. ५०३-५०४ । धवल पु. ११ पृ. २६६, २७३ अादि ।)
छहों लेन्यानों के छब्बीस अंश हैं। प्रत्येक लेश्या के उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य अंश के भेद से (६४३) १८ ग्रंश हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त कापोतलेश्या के उत्कृष्ट से आगे और तेज (पीत) लेश्या के उत्कृष्ट अंश से पूर्व कषायोदय स्थान में आठ मध्यम अंश हैं जो प्रायु-बन्ध के वारण हैं । इस प्रकार हों लेश्याओं के २६ अंश होते हैं।
___ शिलारेखा पृथ्वीरेखा धूलिरेस्वा
जनरेखा उ. ० ००० ० ० ज. | 3. ००० ००० ज. 'उ... ००० ०ज. | उ. ०० ००.०ज.
लेश्या
कृ.
१
१४४४
पायु बन्ध
पाठ मध्यम अंश
गो, जो. गाथा ५१८ का नक्शा [अपने शुद्ध रूप में] पृथ्वीरेखा
धूलिरेखा
शिलारेमा
जलरेण्डा
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ज ,उ ० ०
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कृ. १
+-मध्यमांशाः