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________________ गाथा २७ गृणास्थान/२६ विशेषार्थ-दर्शन और चारित्रगुण का घात करने वाली अनन्तानुबन्धी को चार प्रकृतियाँ और मिथ्यात्व, सम्पग्मिध्यात्व और सम्यकप्रकृति दर्शनमोहनीय कर्म की ये तीन प्रकृतियाँ इसप्रकार सप्त प्रकृतियों के निरवशेष (सम्पुर्ण) क्षय से क्षायिक सम्यग्दृष्टि तथा इन्हीं सात प्रकृतियों के उपशम से उपशमसम्यग्दृष्टि होता है।' क्षायिक और उपशम इन दोनों में सम्यक्त्व को मलिन करने वाली सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय नहीं होने से ये दोनों सम्यक्त्व निर्मल हैं। कषाय चार प्रकार की है-अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरग, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन। इन चारों में से अप्रत्याख्यानाबरण कषाय की संज्ञा द्वितीय कषाय' है क्योंकि क्रम में यह द्वितीय है। प्रत्याख्यान का अर्थ त्याग है। 'अ' निषेधार्थ क न होकर 'ईषत्' अर्थवाची है। 'ईषत् त्याग' का प्रावरण करने वाली कषाय अप्रत्याख्यानावरण कषाय है। इस अप्रत्याख्यानावरण संज्ञक द्वितीय कषायोदय के कारण किंचित् भी संयम धारण नहीं कर सकता अत: यह जीव असंयत होता है। अर्थात् अप्रत्याख्यानावरण द्वितीय कषाय के उदय के कारण उपर्युक्त सप्त प्रकृतियों के उपशम, क्षय या क्षयोपशम से सम्यग्दर्शन हो जाने पर भी संयम धारण नहीं होता। अत: इस गुणस्थानवी जीब को असंयतसम्यग्दृष्टि कहते हैं । चतुर्थ गुणम्यान सम्बन्धी विशेषताएं २सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ट' पबयणं तु सद्दहदि । सद्दाहदि असब्भावं अजाणमारणो गुरुरिणयोगा ॥२७॥ गाथार्थ-सम्यग्दृष्टि जीव उपदिष्ट प्रवचन का नियम से श्रद्धान करता है तथा स्वयं न जानता हुअा, गुरु के नियोग से असद्भुत अर्थ का भी श्रद्धान करता है ।।२।। विशेषार्थ—जो सम्यग्दृष्टिजीव है, वह निश्चय से उपदिष्ट प्रवचन का श्रद्धान करता है। 'पवयण' का अर्थ है प्रकर्ष युक्त वचन, प्रवचन अर्थात् सर्वज्ञ का उपदेश, परमागम और सिद्धान्त ये एकार्थवाची शब्द हैं, क्योंकि उससे अन्यतर प्रकर्षयुक्त वचन उपलब्ध नहीं होता । अतः इसप्रकार के उपदिष्ट प्रवचन का सम्यग्दृष्टि जीव निश्चयसे श्रद्धान करता है, इसप्रकार सूत्रार्थ का समुच्चय है । 'सद्दादि प्रसम्भावं' ऐसा कहने से सम्यग्दृष्टिजीव गुरुवचन को ही प्रमाण करके, स्वयं नहीं जानते हुए असद्भुत अर्थ का भी श्रद्धान करता है, यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस गाथासूत्र में प्राज्ञा सम्यक्त्व का लक्षरण कहा गया है । शा--प्रज्ञानवय असद्भूत अर्थ को स्वीकार करनेवाला जीव सम्यग्दष्टि कैसे हो सकता है ? समाधान—यह परमागम का ही उपदेश है, ऐसा निश्चय होने से उसप्रकार स्वीकार करने वाले उस जीब को परमार्थ का ज्ञान नहीं होने पर भी उसकी सम्यग्दृष्टिपने से च्युति नहीं होती। १. प्र. पु. १ पृ. १७१। २. प. पु. १ सूत्र १२ की टीका पृ. १७३, ज. प. पु. १२ पृ. ३२१, प्राकृत पं. म. [जानपीट] अ. १ गा. १२ एवं लब्धिमार गाथा १०५। ३. ज. प. पु. १२ पृ. ३२१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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