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________________ गाया ४६६-५०६ श्यामार्या / ५८१ लोगारणमसंखेज्जा उदहाला कसावगा होंति ! तत्थ किलिट्ठा प्रसुहा सुहा विसुद्धा तदालाबा ।।४६६|| तिब्बतमा तिव्वतरा सिन्या प्रसुहा सुहा तहा मंदा । मंदतरा मंदतमा छुट्टाएगया हु पत्तेयं ॥। ५०० ।। प्रसुहारणं वरमज्झिमश्रवरंसे किण्हरगोल काउतिए । परिणमदि कमेणाप्पा परिहारणीदो किलेसस्स ॥ ५०१ ॥ काऊ पीले किन्हं परिणमवि किलेसबदिदो अप्पा | एवं किलेसहारणी बड्ढोदो होदि प्रसुहतियं ॥ ५०२ ॥ तेऊ पडमे सुक्के सुहारणमवराविश्रंस प्रप्पा | सुद्धिस्स य बढीवो हारिणीदो प्रादा होदि ||५०३ || संक्रमणं सद्वापरद्वारणं होदि किन्हसुक्कारणं । वढीसु हि साणं उभयं हारिणम्मि सेस उभयेषि ।। ५०४ ॥ लेस्साकस्साबोवरहाणी श्रवरगादवरवड्ढी । साणे श्रवरादो हारणी गियमा परद्वाणे ॥ ५०५।। संकमणे घट्टारा हातिसु बड्ढीसु होंति तष्णामा । परिमाणं च य पुव्वं उत्तकमं होदि सुदरगाणे ॥ ५०६ ॥ गाथार्थ - कषायों के उदयस्थान असंख्यात लोकप्रमाण हैं । उनमें संक्लेश रूप परिणाम शुभलेश्या हैं, विशुद्धपरिणाम शुभ लेश्या है। ऐसा कहना चाहिए ॥४६६॥ तीव्रतम तीव्रतर और तीव्र कषाय रूप परिणाम अशुभ लेग्या है, मन्द, मन्दतर और मन्दतम कषायरूप परिणाम शुभ लेश्या है । प्रत्येक में षट्स्थान पतित हानि-वृद्धि होती है ||५००॥ कृष्ण-नील कापोत इन तीन अशुभ लेश्या के उत्कृष्ट अंश से मध्यम अंश रूप और मध्यम अंश से जघन्य अंश रूप संक्लेश की हानि होने पर जीव क्रम से परिगमन करता है ॥ ५३१ ॥ संक्लेश परिणामों की उत्तरोत्तर वृद्धि होने पर यह आत्मा कापोत, नील और कृष्ण लेश्याओं के जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट अंशों में क्रम से परिणमता है। इस प्रकार संक्लेश की हानि - वृद्धि से तीन अशुभ लेश्याओं में परिणमन होता है। ||५०२ || विद्युद्ध परिणामों में उत्तरोत्तर वृद्धि होने पर यह आत्मा पीत पद्म और शुक्ल इन तीन शुभ लेश्याओं के जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट यशों में परिणमन करता है। विशुद्ध परिणामों में उत्तरोत्तर हानि होने पर यह आत्मा क्रम से शुक्ल, पद्म, गीत के उत्कृष्ट, मध्यम व जघन्य ग्रंशों में श्रमसे परिणमन करता है || १०३ || स्वस्थान संक्रमण और परस्थान संक्रमण के भेद से संक्रमण दो प्रकार का है। कृष्ण लेश्या और शुक्ल लेश्या में वृद्धि होने पर स्वस्थान संक्रमण होता है किन्तु हानि होने पर स्वस्थान और परस्थान दोनों संक्रमण सम्भव हैं। शेप चार लेश्याओं में द्धि हानि होने पर स्वस्थान और परस्थान दोनों संक्रमण सम्भव है || ४०४|| उत्कृष्ट से
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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