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माथा ४०६
दर्गनमागंगा/५७१
"परमाणपादियाई" इत्यादि ४८५ गाथा में विषय के निर्देश द्वारा विषयी का निर्देश किया है, क्योंकि अन्तरंग विषय का निरूपण अन्य प्रकार से किया नहीं जा सकता है । अर्थात् अवधिज्ञान का विषय मूर्तिक पदार्थ है, अतः अवधिदर्शन के विषय भुत अन्तरंग पदार्थ को बतलाने का अन्य कोई प्रकार न होने के कारण मूर्तिक पदार्थ का अबलम्बन लेकर उसका निर्देश किया गया है।'
चाक्षष विज्ञान को उत्पन्न करने वाला जो स्वसंवेदन है वह चक्षुदर्शन है । श्रोत्र, प्राण, जिह्वा, स्पर्शन और मन के निमित्त से उत्पन्न होने वाले ज्ञान के कारणभूत स्वसंवेदन का नाम प्रचक्षुदर्शन है। परमाणु से लेकर महास्कन्ध पर्यन्त पुद्गल द्रव्य को विषय करने वाले अवधिज्ञान के काराभूत स्वसंवेदन का नाम अवधिदर्शन है।
केवलदर्शन का स्वरूप बहुविहबहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्मि खेतम्मि । लोगालोगवितिमिरो जो केवलदसणुज्जोप्रो ॥४८६॥'
मा ...माने अपने काम का लेदों से युक्त बहुत प्रकार के उद्योत इस परिमित क्षेत्र में ही पाये जाते हैं। परन्तु जो केवलदर्शन रूपी उद्योत है, वह लोक और अलोक को भी तिमिररहित कर देता है ।।४८६॥ .
विशेषार्थ-अन्तरंग उद्योत केवलदर्शन है और बहिरंग पदार्थों को विषय करनेवाला प्रकाश कोवलज्ञान है।
शङ्का-चूकि केवलज्ञान स्व और पर दोनों का प्रकाशक है, इसलिए केवलदर्शन नहीं है, ऐसा कुछ प्राचार्य कहते हैं । इस विषय की गाथा भी है
मणपम्जवणाणतो गाणस्स य दसणस्स य विसेसो।।
केवलियं णाणं पुण णाणं ति य दंरुणं ति य समाणं ॥१४३॥ -मनःपर्य य ज्ञान पर्यन्त ज्ञान और दर्शन दोनों में भेद है। परन्तु केवलज्ञान को अपेक्षा तो ज्ञान और दर्शन समान हैं।
समाधान-उन प्राचार्यों का ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि केवलज्ञान स्वयं पर्याय है, इसलिए उसकी दूसरी पर्याय हो नहीं सकती। अर्थात् यदि केवलज्ञान को स्व-पर-प्रकाशक माना जाएगा तो उसकी एक काल में स्वप्रकाश रूप और परप्रकाशरूप दो पर्यायें माननी पड़ेंगी। किन्तु केवलज्ञान स्वयं परप्रकाश रूप एक पर्याय है । अत: उसकी स्वप्रकाशक रूप दूसरी पर्याय नहीं हो सकती। पर्याय की पर्याय होती है... ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि ऐसा मानने पर एक तो पहली पर्याय की दूसरी पर्याय, उसकी तीसरी पर्याय इस प्रकार उत्तरोत्तर पर्याय संतति प्राप्त होती है, इसलिए
१. जयधवल पु. १ पृ. ३५७ । २. धवल पु. १३ पृ. ३५५ । ३. घ.पु. १ पृ. ३८२ ; प्रा. पं. सं. प्र. १ गा. १४१ । ४. जयषवल पृ. १ पृ. ३५७.३५८ |