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गाध। ४८४-४८५
दर्शनमार्गणा/५६६
शङ्का-द्वादशाङ्ग के समवाय नामक चौथे मन में 'भाव की अपेक्षा केवलज्ञान केवलदर्शन के समान है ज्ञेय प्रमाण है" ऐसा कहा गया है। किन्तु श्रिकालगोचर अनन्त बाह्य पदार्थों में प्रवृत्ति करने वाला केवलज्ञान और त्रिकालगोचर अपनी प्रात्मा में प्रवृत्ति करने वाला केबलदर्शन, इन दोनों में समानता से हो सकती है ?
समाधान-प्रात्मा ज्ञानप्रमाण है और ज्ञान त्रिकालगोचर अनन्त द्रव्य-पर्याय प्रमाण है, इसलिए ज्ञान और दर्शन में समानता है । विशेष यह है कि जब दर्शन से आत्मा का ग्रहण होता है तब आत्मा में व्याप्त ज्ञान का भी दर्शन द्वारा ग्रहण हो जाता है 1 शान के ग्रहण हो जाने पर ज्ञान की विषयभूत बाह्य वस्तु का भी ग्रहण हो जाता है 13 इस प्रकार ज्ञान व दर्शन का विषय एक हो जाने से दोनों समान हैं।
शङ्का--तो फिर जीव में रहने वाली स्वकीय पर्यायों की अपेक्षा ज्ञान से दर्शन अधिक है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यह बात इष्ट ही है । शङ्का---फिर ज्ञान के साथ दर्शन की समानता कैसे हो सकती है ?
समाधान --समानता नहीं हो सकती, यह बात नहीं है क्योंकि एक दूसरे की अपेक्षा करने वाले उन दोनों में समानता स्वीकार कर लेने में कोई विरोध नहीं पाता' । कहा भी है
पाया गाणपमारणं गाणं णेयप्पामारणमुद्दिद्व' ।
णेयं लोपालोनं तम्हा पाणं तु सव्य-गयं ।।१६८॥ आत्मा ज्ञानप्रमाण है, ज्ञान जेयप्रमाण है । जय लोकालोकप्रमाण है इसलिए ज्ञान सर्वगत है। ज्ञान के बराबर मात्मा है । दर्शन का विषय आत्मा होने से दर्शन प्रात्मप्रमाण है। इस प्रकार ज्ञान
और दर्शन समान सिद्ध हो जाते हैं। जितने अविभाग प्रनिच्छेद केवलज्ञान के हैं उतने ही अविभागप्रतिच्छेद केवलदर्शन के हैं, इस अपेक्षा भी केवलज्ञान केवलदर्शन समान हैं । ज्ञान सर्वगत है और आत्मा ज्ञानप्रमाण है अत: प्रात्मा भी सर्वगत है। जो सर्वगत है वह सामान्य है। इस प्रकार सामान्य शब्द से प्रात्मा का ग्रहण हो जाता है।
चक्ष-प्रचक्षु-अवधि दर्शन का स्वरूप चक्खूण जं पयासइ दिस्सइ तं चक्खुदंसणं वेति । सेसिवियप्पयासो रणायन्वो सो प्रचक्खूत्ति ।।४८४॥' परमाणुप्रावियाइं अंतिमखंधत्ति मुत्तिदव्वाई। तं प्रोहिदसणं पुरण जं पस्सइ ताई पच्चवखं ॥४८५॥"
१. प. पु. १ पृ. १०१। २. ब. पु. १ पृ. १८५। ३. वृहद्रव्यसंग्रह गा. ४४ को टीका । ४. घपल पु. १ पृ. ३८५। ५. धवल पू. १ पृ. ३८६, प्रवचनसार १/२३ । ६. धवल पु. १ पृ. ३८२, पु.७ पृ. १००, प्रा. पं. सं.अ. १ गा. १२६ । ७. धवल' पृ. १ पृ. १८२, पृ. ७ पृ १०० जयधवल पु. १ पृ. ३५७, प्रा. पं. सं. म.१ गा. १४ ।