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________________ ५५४ / गोसा. जीवकाण्ड गाथा ४७६-४७७ (भूषण), शयन, आसन, घर, यान और वाहन आदि उपभोग कहलाते हैं । इनका परिमार करना भोगोपभोग परिमारण अथवा उपभोग परिभोग परिमाण व्रत है ।" जं परिमाणं कीरड़ मंडल- तंबोल-गंध- पुप्फाणं । तं भोयविरह भरिणयं पढमं सिक्खावयं सुते ॥२१७॥ समससीए महिला वत्थाहरणारण जं तु परिमाणं । तं परिभोयणिवृत्ती विदियं सिक्वाययं जाण ॥२१८॥ [ वसुनन्दिश्रावकाचार ] - मंडन अर्थात् उबटन यादि शारीरिक शृङ्गार, ताम्बूल, गंध और पुष्पादिक का जो परिमाण किया जाता है, उसे उपासकाध्ययन सूत्र में भोगविरति नामका प्रथम शिक्षाव्रत कहा गया है || २१७ ॥ अपनी शक्ति के अनुसार स्त्रीसेवन और वस्त्र आभूषणों का जो परिमाण किया जाता है, उसे परिभोगनिवृत्ति नामका द्वितीय शिक्षावत जानना चाहिए । त्रसघात, मादक, बहुघात, अनिष्ट और अनुपसेक्य ये पांच प्रकार के अभक्ष्य हैं, इनका त्याग यावज्जीवन करना चाहिए। इससे सम्बन्धित लोक इस प्रकार है--- प्रसहति परिहरणार्थं क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये । मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ॥ ६४ ॥ अल्पफल बहुविधातान्मूलकमार्द्राणि शृङ्ग-वेराणि । नवनीत- निम्बकुसुमं तकमित्येवमवयम् ॥८५॥ यवनिष्टं तद्व्रतयेद्यच्चाऽनपुसेव्यमेतदपि जह्यात् । अभिसन्धिकृताविरतिविषयाद्योग्याद् व्रतं भवति || ६६ || [ रत्नकरण्ड श्रावकाचार ] जिन चरण की शरण में रहने वालों को सहिसा टालने के लिए 'मधु' और मांस का त्याग करना चाहिए और प्रमाद अर्थात् चित्त की प्रसाबधानता अविवेकता को दूर करने के लिए मद्य प्रादि मादक पदार्थों (भांग, तम्बाकू आदि) का त्याग करना चाहिए। अल्पफल और बहु विघात के कारणभूत मुली आादिक (गाजर - शलजमा दि ) तथा मासुक अदरक आदि (आलू, सराल, शकरकन्द, अरबी, हल्दी, जमीकन्द आदि, मक्खन, नीम के फूल, केलकी के फूल ये सब और इसी प्रकार की अनन्तकायात्मक दूसरी वस्तुएँ भी त्याज्य हैं । जो पदार्थ अनिष्ट हो अर्थात् प्रकृति के प्रतिकूल हो तथा शरीर को हानिकारक हो वह भी त्याज्य है और जो अनुपसेव्य हो ( जैसे गौमूत्र, जूठन आदि) उसे भी छोड़ देना चाहिए। योग्य विषयों से भी जो संकल्पपूर्वक विरक्ति होती है वह भोगोपभोग परिमाण व्रत है । शङ्का - शरीर तो पर द्रव्य है, इसकी दृष्टि से अनन्तकायात्मक पदार्थों (सौंठ, हल्दी आदि) को सुखाकर ग्रहण करना हिंसा का कारण है ? समाधान - यद्यपि शरीर परद्रव्य है तथापि मोक्षमार्ग में सहायक है, क्योंकि जब तक वजर्षभनाराचसंहनन वाला शक्तिशाली शरीर नहीं होगा, उस समय तक मोक्षप्राप्ति नहीं हो सकती । यही १. सर्वार्थसिद्धि ७।२१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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