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गाथा ४७६-४.१७
संयममार्गणा/५५३
अन्न-पान-खाद्य और लेह्य इन चारों प्रकार के आहार का त्याग करना उत्कृष्ट प्रोषधोपवास है। जिसमें पर्व के दिन जल लिया जाता है वह मध्यम प्रोषधोपवास है और जिसमें आचाम्लाहार किया जाता है, वह जघन्य प्रोषधोपवास है ।।
सामायिकसंस्कारं प्रतिदिनमारोपितं स्थिरीकर्तुम् । पक्षाद्ध योद्ध योरपि कर्तव्योऽवश्यमुपवासः ॥१५१।। मुक्तसमस्तारम्भः प्रोषधदिनपूर्ववासरस्या ।
उपवासं गृह्णीयान्ममत्वमपहाय वेहादौ ॥१५२॥ [पुरुषार्थसिद्धय पाय]
- प्रतिदिन अंगीकार किये हुए सामायिक संस्कार को स्थिर करने के लिए दोनों पक्षों के अर्द्धभाग में अर्थात् अष्टमी चतुर्दशी के दिन उपवास अवश्य ही करना चाहिए। समस्त प्रारम्भ से मुक्त होकर शरीरादिकों में आत्मबुद्धि को त्यागकर उपवास के पूर्वदिन के प्राधे भाग में उपवास को अंगीकार करना चाहिए।
चतुराहारविसर्जनमुपवासः प्रोषधःसकृद्भुक्तिः । स प्रोषधोपवासो यकुपोष्यारम्भमाचरति ॥१०॥ रत्नकरण्डश्रावकाचार]
--चार प्रकार के आहारत्याग का नाम उपवास है। एक बार भोजन करना प्रोषध या एकाशन है। प्रोषधसहित उपवास प्रोषधोपवास । जो उपवास धारण करके धारणा और पारणा के दिन एकाशन करना है वह प्रोषधोपवास शिक्षाबत कहा जाता है।
भोगोपभोगपरिमाण–भोगोपभोग का लक्षण
भुक्त्वा परिहातव्यो, भोगो भक्त्वा पुनश्च भोक्तव्यः ।
उपभोगोऽशनवसनप्रभृतिः पाञ्चेन्द्रियो विषयः ।।८३॥ —जो पाँच इन्द्रिय विषय एक बार भोगने पर त्याज्य हो जाता है वह 'भोग' है। जैसे भोजन पान विलेपनादिक । और जो पंचेन्द्रिय विषय एक बार भोगने पर पुनः भोगने के योग्य रहता है वह 'उपभोग' है। जैसे वस्त्र, आभरण आदिक ।
भोगोपभोगमूला विरताविरतस्य नान्यतो हिंसा।
अधिगम्य वस्तुतत्वं स्वशक्तिमपि तावपि त्याज्यौ ॥१६१॥[पुरुषार्थसिद्धय पाय] - संयतासंयत्त श्रावक के भोग और उपभोग के निमित्त से हिंसा होती है, अन्य प्रकार से नहीं, अतएव भोग और उपभोग भी, वस्तुस्वरूप जानकर और अपनी शक्ति अनुसार छोड़ने योग्य अथवा परिमाण करने योग्य है।
भोजन, पान, गन्ध और माला आदिक भोग कहलाते हैं तथा प्रोढ़ना-बिछाना, अलंकार
१. चारित्रपाहुड़ गा. २५ की टीका । २. रत्नकरण्डयावकाचार ।