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________________ ५३८/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४७७-४७३ द्रव्यसामायिक- सोना, चांदी, मोती, रत्न, मृतिका, लकड़ी, मिट्टी का ढेला, कण्टकादिवों में समदर्शन अर्थात् रागद्वेष का अभाव रखना द्रट्यसामायिक है । क्षेत्रसामायिक श्रोई क्षेत्र रम्य होता है जैसे उपवन, नगर, नदी, कुआ, सरोवर आदि और कोई क्षेत्र अप्रिय होता है जैसे रुक्ष, कण्टक से भरा हुमा, विषम, रमहीन-शुष्क, अस्थि-पाषाणों से राहित ऐसे प्रदेश तथा जीर्ण उपवन, शुष्क नदी, रेतीला [जल रहित] प्रदेश, बालुका प्रदेश इनके ऊपर राग द्वेष का त्याग करना क्षेत्रसामायिक है। कालसामायिक--वसन्त ग्रीस्मादिक छह ऋतु, रात्रि, दिवस, शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष इत्यादिक काल पर रागद्वेष रहित होना काल सामाधिक है। भावसामायिक-सर्व जीवों में मैत्री भाव रखना तथा अशुभ परिणामों का त्याग करना भाव सामायिक है । सर्व सावधयोग का त्याग रूप एकसंयम अथवा अभेदसंयम सोहो सामायिक संयम है इसका सविस्तार कथन गाथा ४६७-४६६ मा दीका में धवलादि के प्राचारः परश्या जाचका है। यह सामायिक संयम अनुत्तर अर्थात् अनुपम है और दुर्लभ है । जिन्होंने पिच्छी लेकर अंजुलि बोड़ली है तथा जो सावधान बुद्धिवाले हैं वे मुनि व्याक्षिप्त-चित्त न होकर, खड़े होकर एकाग्र मन होते हुए प्रागमोक्त विधि से सामायिक करते हैं। अथवा पिच्छी से प्रतिलेखन करके शुद्ध होकर; द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव शुद्धि करके प्रकृष्टरूप से अंजलि को मुकुलित कमलाकार बनाकर : अथवा प्रतिलेखन (पिच्छिका) सहित अंजुलि जोड़कर सामायिक करते हैं । छेदोपस्थापना संयम-सामायिक संयम ग्रहण करने के पश्चात् प्रमादवश यदि सावध क्रिया हो जाय तो प्रायश्चित्त विधान से दोष का छेद करके अपनी प्रात्मा को पंच प्रकार के संयम रूप धर्म में स्थापना करना छेवोपस्थापना संयम है । छेद का अर्थ प्रायश्चित्त है अर्थात प्रायश्चित्त के द्वारा उपस्थापना (अपनी प्रात्मा को धर्म में स्थापना करना) छेदोपस्थापना संयम है । अथवा दोष लगने पर तप या दीक्षाकाल का छेद करके उपस्थापना अर्थात् निर्दोष संयम में प्रात्मा की स्थापना करना छेदोपस्थापना संयम है। स-स्थावर आदि जीवों की उत्पत्ति और हिंसा के स्थान छदमस्थ के अप्रत्यक्ष होने के कारण प्रमादबश स्वीकृत निरबद्य क्रियाओं में दुषण लगजाने पर उसका सभ्यक प्रतिकार करना छेदोपस्थापना है। अथवा सावध कर्म हिंसादि के छेदों से पांच प्रकार के हैं, इत्यादि विकल्पों का होना छदोपस्थापना है। श्री अजितनाथ से श्री पाशवनाथ तक बाईम तीर्थंकरों ने सामायिक संयम का उपदेश दिया था। श्री वृषभनाथ और श्री महावीर प्रभु ने छेदोपरथापना का उपदेश दिया है। कथन करने में, पृथक पृथक चिन्तन करने में और समझ लेने में सुगम होने से पाँच महाधनों का वर्णन किया है। १. मूलाचार पृ. ४०२-४०३ अधिकार ७ माथा १७ की दीका। २. मूलाचार अधिकार ७ मा. ३६ पृ. ४१५ । ३. संस्कृत टीका के अाधार में। ४. रावा.-१८।६-७ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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