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गाया १६-२०
गुणस्थान / २३
शङ्का -- अनन्तानुबन्धी कपायों की शक्ति दो प्रकार की है, इस विषय में क्या युक्ति है ?
समाधान – सम्यक्त्व और चारित्र इन दोनों का घात करने वाले ये अनन्तानुबन्धी क्रोधादिक न तो दर्शनमोहनीय स्वरूप माने जा सकते हैं, क्योंकि सम्यक्त्वप्रकृति, मिध्यात्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के द्वारा ही आवरण किये जाने वाले सम्यग्दर्शन के श्रावरण करने में इनके फल का प्रभाव है और न अनन्तानुवन्धी को चारित्रमोहनीय स्वरूप भी माना जा सकता है, क्योंकि अप्रत्याख्यानावरणादि कषायों के द्वारा आवरण किये गए चारित्र के आवरण करने में इनके फल का अभाव है । यद्यपि उपर्युक्त प्रकार से इन श्रनन्तानुबन्धी कषायों का प्रभाव सिद्ध होता है, तथापि इनका प्रभाव नहीं है, क्योंकि सूत्र में इनका अस्तित्व पाया जाता है। इन अनन्तानुबन्धी कषायोदय से सासादन की उत्पत्ति होती है अन्यथा उत्पत्ति हो नहीं सकती। इससे अनन्तानुवन्धी के दर्शनमोहनीयता और चारित्रमोहनीयता सिद्ध होती है तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्क का चार व्यापारी नहीं है, क्योंकि वह चारित्र की घातक अप्रत्याख्यानावरणादि प्रकृतियों के उदय प्रवाह को श्रनन्तरूप कर देता है । '
एक जीव की अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टि का जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल छहआवलि प्रसारण है और एक समय से लेकर एक-एक समय अधिक करते हुए एक समय कम छह ग्रावलि तक मध्यमकाल है। कहा भी है
उवसमसम्मत्तद्वा जस्तियमेसा हु होई प्रवसिट्टा |
परिवज्जेता साणं तलियमेत्ता य तस्सद्धा ॥३१॥ (०० ४१० ३४१ ) उबसमसम्मत्तद्धा जइ छावलिया हवेज्ज श्रवसिड्डा ।
तो सासणं पवज्जइ गो हेदुषकटुकालेसु ॥ ३२ ॥ ( ध०पु० ४ पृ० ३४२ )
- जितने प्रमाण उपशम सम्यक्त्व का काल अवशिष्ट रहता है, उस समय सासादनगुणस्थान को प्राप्त होने वाले जीवों का भी उतने प्रमाण ही सासादन गुणस्थान का काल होता है। यदि उपशम- सम्यक्त्व का काल छह ग्रावलिप्रसारण अवशिष्ट हो तो जीव सासादनगुणस्थान को प्राप्त हो सकता है। यदि छह प्रावलि से अधिक काल अवशिष्ट रहे तो सासादन गुणस्थान को नहीं प्राप्त होता ।।३१-२२ ।।
यद्यपि श्री यतिवृषभाचार्य के मतानुसार जिसने अनन्तानुवन्धी की त्रिसंयोजना करके द्वितीयोपशम को प्राप्त कर लिया है वह भी द्वितीयोपशमसम्यक्त्व से गिरकर सासादन को प्राप्त हो सकता है, तथापि उसकी यहाँ विवक्षा नहीं है, क्योंकि गाथा १६ में 'प्रादिमसम्मत्त' पद द्वारा प्रथमोसम्यक्त्व को ही ग्रहण किया है। श्री भूतबली प्राचार्य का भी यहो मत है कि प्रथमोपशमसम्यक्त्व से च्युत होकर सासादनगुणस्थान को प्राप्त होता है, द्वितीयोपशम से गिरकर सामादन को प्राप्त नहीं होता है। धवल ग्रन्थानुसार ही गो.जो. ग्रन्थ की गाथाएँ रची गई हैं ।
सासादन को प्राप्त होने पर आवलि के प्रथम प्रसंख्यातवें भाग में मरण होने पर नियम से देवगति में उत्पन्न होता है। उसके ऊपर मनुष्यगति के योग्य प्रावलि के प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण
१. ध. पु. ९ पृ. ४२-४३ । २. ज. प्र. पु. ४ पृ. २४ । ३. ध.पु. ५ पृ. ११.